बुधवार, 19 अगस्त 2015

क्या वाक़ई ज़िन्दगी

क्या वाक़ई ज़िन्दगी

कोई गीत है

या कोई खेल तमाशा

या उम्मीदों सा सर फोड़ता

सख्त पत्थर है कोई

कभी ये गिराती है

तो कभी ये उठाती है

जब गिराती है ज़िन्दगी

तो ये पाताल पर भी नही रूकती

और जब उठाती है

तो पार कर जाती है

सातों आसमां

ज़िन्दगी आखिर है क्या

ज़िन्दगी भर

ये ये मेहनतकशों की दुनिया

इजारेदारी की गुलामी की

ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ

इन संगलाख बन्धनों को

तोड़ देना चाहता है

क्योंकि अब वो समझ चूका है

ज़िन्दगी वाक़ई अगर है तो

महज़ आज़ादी में ही

ज़िन्दगी है तो बस

बराबरी के निज़ाम में है

सिवाए इसके ये

ज़िन्दगी कुछ नही

कुछ भी नहीं.....

~इमरान~

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