मंगलवार, 5 अगस्त 2014

फिलिस्तीन के नाम

तुझे कब्र में किस तरह उतारूं मेरी बच्ची

अभी तो तुझे जी भर के देखा नहीं था,

हाथ मेरे कफ़न तुझको पहनाएं क्यूँकर,

इन हाथों ने तुझे ईद का जोड़ा देना था,

मेरे आंगन में तेरी किलकारी गूँजती थी,

अब वहां तेरी मौत का पसरा है मातम ,

तुम्हारी माँ को दूँ मैं कैसे दिलासा,

बताऊँ क्या ज़ालिम ने किया है सितम,

तुझे कब्र में किस तरह उतारूं मेरी बच्ची,

अभी तो तेरा बचपन शुरू भी न हुआ था,

शनिवार, 2 अगस्त 2014

ज़िन्दगी जीना चाहती है

ज़िन्दगी जीना चाहती है,

वो तुमसे फ़क़त आजादी चाहती है,

जमाने की पाबंदियों से नाखुश सी,

दबी सहमी सी नाज़ुक कली,

गुलशन में हंस के खिलना चाहती है,

नहीं मंज़ूर उसे तुम्हारी बंदिशें,

ये मज़हब के चोगे,ये दाढ़ी की चुभन,

उतार फेंके ये ज़बरदस्ती का हिजाब,

बचपन में बियाहे जाने का अज़ाब,

खुल कर सांस लेने की चाहत,

जवानी लग्ज़िशें आजमाना चाहती है,

वो तुमसे फ़क़त आज़ादी चाहती है,

उसे क्यों डर के जीना पड़े,

सात पर्दों में क्यूकर घुटना पड़े,

बचपन भी अपना क्यूँ खोना पड़े,

बस तुम्हारे इस मज़हब की खातिर

उसे क्यों जमाने से दबना पड़े,

निकल के बाहर खुली हवा में,

सांस लेना वो भी चाहती है,

वो तुमसे फ़क़त आज़ादी चाहती है.....

~इमरान~