मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

धर्म और नैतिकता

राजस्थान मेघदूत में प्रकाशित (चित्र संलग्न)

कभी किसी खाली वक़्त में गौर से अपने आस पास के मज़हबी लोगों को देखिएगा....अजब हैरान परेशान से आत्मसंतोष का ढोंग करते ये लोग आपको एक अलग ही दुनिया की अनुभूति देंगे....मौत के बाद किसी संभावित काल्पनिक ज़िन्दगी की आस में अपना जीवन बर्बाद करते हुए ऐसे लोग आपको हर जगह दिख जायेंगे....महज़ धर्म की बिना पर किसी से प्रेम या नफरत करना ऐसे लोगों का प्रधान गुण होता है....
कोई व्यक्ति कितना ही बुरा क्यों न हो , यदि वो इनकी जाती और इनके धर्म का अनुयायी है और वो किसी ऐसे नेक और शरीफ आदमी से भिड़ गया है जो किसी दुसरे धर्म को मानता है तो यह लोग अपने धर्म/मज़हब वाले व्यक्ति की लाख गलती के बावजूद भी उसी अपने सहधर्मी का ही साथ देंगे .....
इस तरह की अंध पक्षपातपूर्ण धार्मिकता सबसे पहले व्यक्ति की न्याय क्षमता और इस प्रकार उसके सही गलत की समझ और सच के साथ खड़े होने की सलाहियत को ख़त्म कर देती है.....और फिर जो इंसान सही के साथ खड़े होने की काबिलियत नही रखता उससे आप क्या उम्मीद कर सकते हैं की वो अपने जीवन में कुछ कर सकेगा?
अच्छा इंसान बन कर समाज के लिए कुछ करने की बात तो छोड़ ही दीजिए,ऐसे लोग खुद अपनी अंतर्मन की आवाज़ को मार के अपने आप को ही धीरे धीरे समाप्त कर देते हैं.....
सही और गलत की पहचान हर इंसान के अंदर स्वाभाविक रूप से होती है...इसके पीछे कोई धर्म नही बल्कि उसकी स्वाभाविक संवेदना होती है जो उसे सही और गलत की समझ प्रदान करती है....कुछ लोगों का कहना है कि इस सही और बुरे के भेद को स्पष्ट करने वाली भावना व्यक्ति में धर्म से आती है....लेकिन ऐसा नही है....अक्सर लोग धार्मिक होते हुए भी अपने धर्म की बहुत सारी बातें नही मानते,या मानते भी हैं तो उसको कभी व्यव्हार में नही लाते....क्योंकि उनका अंतर्मन और उनकी सही को सही और गलत को गलत समझने की स्वाभाविक मानवीय तार्किकता उन्हें ऐसा करने से रोकती है....जैसे इस्लाम में चार शादियों की अनुमति है लेकिन बहुसंख्यक मुस्लिम इसे सही मानते हुए भी व्यवहार में 4 शादियां नहीं करते , ऐसा वो क्यों करते हैं?क्योंकि उन्हें कहीं न कहीं मन में इस बात का अहसास होता है कि ऐसा करना गलत होगा...यह अन्याय होगा अपनी जीवन संगिनी से जो उसके लिए अपना घर परिवार छोड़ उसके प्रेम में खुद को समर्पित किये हुए उसके साथ रह रही है....जो उसके सुख दुःख की साथी रही है....
यह भाव मनुष्य को धर्म नही बल्कि उसका अंतर्मन कहें या उसकी मानसिक तार्किकता कहें,या धर्म से इतर जो भी कह लें ,उसी से मिलता है....अक्सर धार्मिक जन यह दावा करते हैं की नैतिकता का मूल स्त्रोत धर्म है....क्या ऐसा वास्तविकता में है? यदि हम इसकी गहराई में जाएंगे तो पता चलेगा की वास्तविकता में यह सत्य के एकदम नज़्दीक से होकर गुज़रता एक ऐसा मिथ्या विचार है जो सत्य की तरह दिखने के कारण सत्य प्रतीत होता है..वास्तव में नैतिकता तो मनुष्य के अंतर्मन में ही वास करती है....उसका कहीं बाहर से आना संभव ही नही है....इसका कारण और इसके पीछे का तर्क भी वही है जो उपर लिखा जा चूका है.....नैतिकता तो सही को सही और गलत को गलत कहने की सलाहियत का नाम है....वो गलत चाहे धर्म के नाम पर हो रहा हो या किसी वाद के नाम पर....और सही को सही कहना और उसके साथ खड़ा रहना भी नैतिकता है....चाहे वो सही बात करने वाला व्यक्ति आपका कितना ही बड़ा प्रतिद्वंदी क्यों न हो....
एक बात इस विषय में और लिखूंगा....कभी मन से इसको सोचिये और आज़मा कर अवश्य देखिएगा....एक पल को अपने मन से धर्म,जाती,देश मज़हब और वाद की समस्त भावनाओं को अपने मन से एकदम समाप्त करके उनका एकदम से विसर्जन करके फिर अपने आस पास मौजूद इंसानों को देखिएगा....फिर देखिएगा आपके मन में मानवता के लिए कितना प्रेम उमड़ता है....सब लोग आपको आपके अपने लगने लगेंगे....बिलकुल सगे रिश्तेदार जैसे और यह सच भी है की दुनिया के सब इंसानों के बीच आपस में खून का रिश्ता है....
यह तो धर्म/वाद/सीमायें हैं जो उन्हें एक दूसरे में भेद करना और अलगाव पैदा करना सिखाती हैं....यह सब विकार है हमारे पैदा किये हुए  जो इंसान को इंसान से अलग करते हैं....
हो सकता है कोई धर्म अपने समय की व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन रहा हो...लेकिन आज के दौर के लिहाज़ से वो आंदोलन परिमार्जित हो चुके हैं....कोई भी आंदोलन...कोई विद्रोह या कोई सुधार समय के साथ ही कालातीत हो जाता है और एक समय ऐसा आता है कि जब परिस्थितयों के चलते वो आंदोलन या सुधार वर्तमान हालातों में लागू किये जाने के लिहाज़ से सुधार के बजाये बिगाड़ बन जाता है....
हो सकता है कोई विचार किसी समय के लिहाज़ से वरदान रहा हो,लेकिन वक़्त के साथ साथ वो वरदान अभिश्राप भी बन जाता है यह भी सत्य है....क्योंकि सृष्टि सदैव परिवर्तनशील है....
मनुष्य की आवश्यकताएं...समाज में व्याप्त दोषों के आधार पर उसमें सुधार के लिए आवश्यक ज़रूरतें और उन सुधारों के मापदंड सदैव परिवर्तित होते रहते हैं स्थितियों के साथ साथ....जिस काल में जिस समाज में जैसे हालात होंगे उनमें उन्हीं हालातों और स्थितियों के अनुरूप सुधार किया जाएगा....
हज़ार हज़ार साल पुराने फार्मूले हमेशा लागू नही किये जा सकते उनपर....ऐसा करेंगे तो सुधार की बजाये बिगाड़ होना निश्चित ही है....
लेकिन धर्म को तो ज़िद है कि उसे बदलना नही है...धर्म को ज़िद है की बदलना तो समाज को ही है....एक मिसाल देता हूँ.....आप कोई कपडा बनवाते हैं,समय के साथ शरीर का माप बदलने के साथ वो कपड़ा आप हमेशा नही पहन सकते ,उसे बदलना होता ही है, लेकिन कपडा अगर ज़िद थाम ले की आपको तो मुझे ही पहनना है,तो आप क्या करेंगे...ज़ाहिर है उसे फेंक देंगे....
यह मानव स्वभाव है कि जो इसके अनुसार नही चल सकता उसकी वर्तमान परिस्थितियों के लिहाज से यह उसका परित्याग कर देता है....यही हाल धर्म का भी होना है और इसका आरम्भ विज्ञानवाद और तर्कवाद के प्रति बढ़ती जनमानस की रूचि के रूप में हो ही चूका है.....एक न एक दिन मानवता धर्म को भी पुराने कपडे की भांति उतार कर फेंक देगी.....
~इमरान~

रविवार, 28 दिसंबर 2014

गर तुम खुदा थे

राजस्थान मेघदूत में प्रकाशित (चित्र संलग्न)

गर तुम खुदा थे ,

तो रोक लेते पेशावर में अपने बन्दों को,

बहाने से नन्हे बच्चों का खून,

खून जो उनके माँ बाप का था,

उनकी रगों में दौड़ता,

उन्हें फर्श पर बहा के,

क़त्ल कर दिया उनका भी,

साथ बच्चों के माँ बाप ने,

दफन कर दिया दिल अपना भी,

तुम अगर खुदा थे,

तो न लूटने देते किसी दामिनी को,

सर ए बाजार न नीलाम होने देते,

चौरासी के मज़लूमों को,

अगर तुम थे वजूद में मौजूद,

रोकते गुजरात में दरिंदों को,

बड़ी लड़ाइयों में पीसने वाले मासूम

बच जाते मरने से,

लेते ही तेरा नाम,

आ जाता कोई फरिश्ता आसमान से,

और रोक लेता तेरे भक्तों और बन्दों को,

क़त्ल करने से उन मासूमों का,

जिन्होंने तड़पते हुए,

आग में जलने से पहले,

हज़ारों बार रो रो कर,

ज़ार ओ क़तार आंसू बहाये थे,

तुझे पुकारा था,

तुझे बुलाया था,

जो नही रोक तूने,

तू बराबर गुनाह में शामिल,

जो न रोक सका तो फिर,

किस बात का खुदा बनता है?

सच तो यह है,

कि तेरा कोई वजूद नही,

काश कि वो जानते होते,

कि तू तो मर चूका है,

और तेरा जिस्म कहीं

दूर पड़ा किसी सहारा में,

सड़ता हुआ बदबू में सना

पड़ा हुआ है बस,

उसे दफनाने नही देते,

वो कि जिनकी रोटियां,

आती हैं सपने दिखा कर,

तेरे जागने के सपने,

जो कभी पूरे नहीं होंगे,

क्योंकि तू तो कभी,

पैदा ही नही हुआ ,

तुझे तो बस ज़ेहनो में बसाया गया,

लोगों को डराने के लिए,

उन्हें डरा कर के,

भट्टी में खपाने के लिए,

कि वो बस खौफ ए खुदा में,

डरे सहमे से रहकर,

बेचते रहें अपना जिस्म,

पिलाते रहें अपना लहू,

और लहू पर बनते रहें,

महल तेरे क़रीबी बन्दों के,

मीनार तेरे वलियों की मज़ारों के,

बुतक़दे तेरे सनमखानों के,

और उन बुतकदों में पिसती,

कभी कोई अहिल्या,

तो कभी कोई मरियम,

कभी कोई छोटी बच्ची,

और कभी कोई मलाला,

तो कभी पेशावर के नन्हे तलबा,

और चलता रहे कारोबार,

तेरे क़रीबी बन्दों का.....

~इमरान~

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

मंज़िल और सफ़र....

ज़िन्दगी एक न एक बार हर किसी को सफ़र का मौक़ा ज़रूर देती है..उसका भी ये पहला मौक़ा था जब वो घर से बाहर कहीं सफर के लिए निकल रहा था,
ऐसा नहीं था की इसके पहले कभी उसने सफर का कोई तजुर्बा हासिल न किया हो,छोटे मोटे नज़दीकी रास्तों का उसे खूब अनुभव था,लेकिन इस बार बात कुछ अलग थी,इस बार का सफर उसकी ज़िन्दगी में बेहद अहमियत रखता था,क्योंकि जिस मंज़िल के हासिल करने के लिए वो ये सफ़र करने जा रहा था वो उसकी ज़िन्दगी में बहुत ऊँचा मक़ाम रखती थी,या यूँ कह लीजिए वो उसकी ज़िन्दगी का मक़सद थी,
रास्ता बेहद तवील होने के चलते इस सफर पर बिना एक साथी के नही निकला जा सकता था,दरअसल काफी अरसे से इस सफर की ख्वाहिश होने के बावजूद भी वो एक अदद हमसफ़र के न होने के चलते ही इब्तिदा करने से घबरा रहा था,
अब जाने को तो उसके आस पास कई ऐसे लोग थे,जिनमे से किसी को भी वो अपने साथ लेकर जा सकता था,लेकिन वो लोग उसके दिल ओ दिमाग के मुताबिक नही थे,उसकी शख्सियत की कसौटी पर खरे नहीं उतरते थे, हालाँकि,उन लोगों में कोई खराबी रही हो ऐसा कुछ न था,सब एक से बढ़ कर एक हसीन खूबसूरत और खूबसीरत लोग थे,लेकिन जिस खूबी की उसे तलाश थी वो भी नही थी उनके पास,
अक्सर ऐसा होता है कि हमारे पास कई बेहतर से बेहतर लोग मौजूद हों,लेकिन फिर भी ज़ेहन के किसी एक कोने पर हम खुद को तन्हा पाते हैं...इसकी वजह शायद उन लोगों का हमारे मन के उस कोने तक न पहुच सकना होता हो,वो कोना जहाँ हम हकीकत में मिला करते हैं या जहाँ हमारी हक़ीक़त मिला करती है,
ज़ेहन के इस कोने का दरबान बड़ा सख्त होता है, ये हर किसी को अंदर आने भी नहीं देता,जैसे तैसे अगर कोई उस दरवाज़े के आस पास पहुच भी गया तो फिर सख्त तलाशी के दौर शुरू होते हैं, फिर तसल्ली न होने पर उसे वहीँ दरवाज़े से वापस भेज दिया जाता है,
बहुत कम लोग हमारी ज़िन्दगी में इस दरवाज़े को पार कर पाते हैं,और एक बार अंदर आ जाने पर बाआसानी बाहर नहीं निकल पाते,
किस्सा मुख़्तसर यह कि हमारी कहानी के इस किरदार को भी ऐसे ही किसी शख्स की तलाश थी जो उसे मिला भी,एक ऐसा शख्स जो सीधे उसकी निगाहों के रस्ते से मन में उतरा तो फिर उतरता चला गया,दरअसल वो मिल तो काफी पहले गया था लेकिन उसे इस बात का अहसास होने में थोडा सा वक़्त लग गया था,
फिर एक दिन वो वक़्त भी आया जब दोनों ने सफ़र की शुरुआत करने का फैसला किया...
वो दोनों बेहद खुश थे और उन्हें अब मन्ज़िल के मिल जाने का पक्का यकीन हो चला था,पूरी तयारी और जोश के साथ एक दूजे का हाथ थामे उन्होंने चलना शुरू कर दिया,एक दुसरे को देखते,हंसते मुस्कुराते से,जब वो उसकी आँखों में गहरे से झांकता तो उसके गालों पर लाली छा जाती...उन्हें ऐसा लगता मानो पूरी दुनिया की ख़ुशी इन चार आँखों के दरम्यान में सिमट आई हो,और इसके सिवा दुनिया में कुछ है ही नहीं....
इसी हालात में अक्सर तो ऐसा होता की दोनों मन्ज़िल के बारे में भूल ही जाते और सफर के पेंचो खम में एक दूसरे के साथ का मदमस्त कर देने वाला अहसास उन्हें मदहोश किये रहता...एक दूसरे में खोये हुए से,थमे हुए,अहसास की उस मंज़िल पर पहुचे हुए जहाँ से कोई वापस नहीं आना चाहता लेकिन कुछ मजबूरियों के चलते वापस आ जाना ही पड़ता है....लेहाज़ा उन्हें भी वापस आना ही पड़ता और फिर दोनों सफर की मंज़िल तय करना शुरू कर देते थे...
एक दूसरे से बातें करते और मंज़िल के बारे में सोचते हुए बकिया ज़िन्दगी और वहां रहने सजाने और बिताने के बारे में घण्टो तक बातें किया करते थे....कभी कभी दोनों में किसी बात को लेकर मीठी बहस भी हो जाती थी जो आखिर में एक राय होकर खत्म भी हो जाती थी...
इसी सफर में एक मौक़ा ऐसा भी आया जब दोनों को अपनी मन्ज़िल सामने नज़र आने लगी...साफ़ शफ्फाक और एकदम आँखों के सामने बस चन्द क़दमो की दूरी पर,वो मंज़िल जिसकी तलाश में उन्होंने इतना लम्बा और खूबसूरत सफर तय किया था,दोनों दुगनी रफ़्तार से मन्ज़िल की तरफ बढ़ने लगे....एक दूजे का हाथ थामे वो उस जानिब बढ़ ही रहे थे की अचानक से उसकी हमसफ़र ने उसको रोक दिया...वो शख्स वहीं ठिठक कर खड़ा हो गया....और सवालियां निगाहें उसके चेहरे पर गड़ा दीं....
क्यों रोकती हो?मन्ज़िल सामने आ गयी है....
हाँ,देखा...
फिर?हमने इतना लम्बा सफर इसीलिए तो तय किया है जाना,इसी मंज़िल को हासिल करने के लिए जो हमारे सामने है...फिर रोकती क्यों हो?
हमसफ़र जवाब देती है-हाँ किया तो सही...लेकिन ज़रा उस सफ़र का भी सोचो...जो हमने एक दूजे के साथ तय किया है...उस सफ़र के अहसासात,एक दूसरे के साथ का लुत्फ़....और सबसे बढ़कर यह जानना कि दो लोगों के साथ और हमसफ़री के हक़ीक़ी मायने क्या होते हैं....मेरा तुमसे सवाल बस इतना है...क्या इस मंज़िल पर पहुच कर भी हम उस अहसास को दोबारा और वैसे ही कभी भी जी पाएंगे?जैसा की हमने इस सफ़र के दौरान जिया है?
उसकी बात जायज़ थी,शख्स एक सोच में पड़ गया,लेकिन हमसफ़र ने आगे बोलना जारी रखा,
ज़रा सोचो न जाना,हम आज इस मन्ज़िल के एकदम पास पहुच गए हैं....थोड़ी देर में हम इसके अंदर होंगे,कुछ आराम करेंगे,थोडा जश्न मनाएंगे,फिर उसके बाद?उसके बाद हमारे पास करने के लिए क्या बचेगा?ये जो इस सफ़र में हमने एक दूसरे को जिया है,एक दूसरे कि तकलीफों में हम साथ रहे हैं और खुशियों के जिन पलों को हमने सांसो में उतारा है अपनी,उन पलों को हम दोबारा पा सकेंगे क्या?
वो शख्स वहीँ पास एक पत्थर पर बैठ कर उसकी बातें ध्यान से सुनने लगा....हमसफ़र उसके क़दमों के पास बैठी और उसके जानू पर अपना सर रख के उसे सफ़र की मीठी यादों और तजुर्बों का ज़िक्र करने लगी.....
यह बड़ी अजीब सी स्थिति थी.....जिस मक़सद के लिए उन्होंने यह सफर अंजाम दिया था वो एकदम सामने होने के बाद उन्हें अपने मक़सद के बजाये वो रास्ता ज़्यादा भा रहा था जिसके ज़रिये वो यहां तक पंहचे थे,

"बेशक रास्ता मंज़िल नहीं हुआ करता,लेकिन मन्ज़िल हमेशा मन्ज़िल हो यह भी तो ज़रूरी नही न,महज़ कुछ पुराने ख्यालात की बिना पर किसी मन्ज़िल को मन्ज़िल और रस्ते को रास्ता क़रार दिया हुआ है हमने....लेकिन क्या यह ज़रूरी है कि हज़ारों साल पहले लिखी गयी जगह आज भी मन्ज़िल ही हो या फिर रास्ता वही रास्ता हो....."
हमसफ़र की बातें उसकद कानो के ज़रिये ज़ेहन की नसों में तैरती जा रही थीं....उसके नज़रिये में कुछ इंक़लाबी सा बदलाव आ रहा था...उसे सोचने पर मजबूर होना पड़ गया,जिसे वो अब तक मन्ज़िल समझ रहा था और उसकी याद में पागलों की तरग दौड़ लगाता फिर रहा था वो आज अगर पा भी ली तो क्या?
यह सफर अगर खत्म हो गया तो फिर आगे क्या होगा?जीवन का रोमांच और मक़सद फिर वो किसमें तलाश करेगा?कहाँ ढूंढेगा ज़िन्दगी को और कैसे?इन्ही ख्यालों की उधेड़बुन में दोनों देर तक खोये रहते हैं,एक बारगी कुछ फैसलाकुन अंदाज़ में सर झटके जाते हैं,मुस्कुराया जाता है...उदास हुआ जाता है और फिर बातें शुरू हो जाती हैं.....फिर एक बारगी अचानक उसके होंटो पर एक शांत सी मुस्कुराहट खेलने लगी है,वो अपनी हमसफ़र की आँखों में देखता है...नज़रें मिलते ही उसके होंटो पर भी वही मुस्कान तैर जाती है...मानो वो कह रही हो,मैं समझ गयी तुम्हारे मन की बात....यह बात बहुत कम लोग महसूस कर पाते हैं लेकिन सफर में एक मन्ज़िल ऐसी भी आती है जबकि लफ्ज़ कम पड़ जाते हैं या यूँ कहें की लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं रह जाती है...ऑंखें ही सब हाल बयान कर दिया करती हैं....बड़ा खूबसूरत होता है यह अहसास जिसे कि आज तक लफ़्ज़ों में बयान नहीं किया जा सका है, उनको बड़ा अच्छा लगता था हर बा जब ऐसा होता था,दोनों अपनी जगह से उठते हैं और एक दूजे का हाथ थामे एकबारगी होंटो पर होंट रखे एक दूसरे को कुछ देर तक चूमते रहते हैं,और मन्ज़िल के सामने दूसरी ओर को जाते हुए एक बेहद दिलकश लेकिन सुनसान और अंतहीन रास्ते की जानिब बढ़ जाते हैं....इस बिना किसी आने वाली मंज़िल के तय किये...मानो दोनों के दिल में यह सच बैठ गया हो...की यही सफर ही तो वो मंज़िल है...जिसकी उन्हें तलाश थी.....इसे खत्म नही होने देना है कभी.....वरना इसके साथ ही एक दिन वो भी खत्म हो जायेंगे......
कहीं पीछे छूट गयी उनकी वो पुरानी मन्ज़िल, जो दरअसल कभी उनकी मन्ज़िल थी ही नहीं......उनको जाते हुए देखती है....मानो उन दोनों से कह रही हो कि....मुबारक हो तुम्हें! आज तुमने एक दूजे को खुद से जुदा होने से बचा लिया है,और अपने रिश्ते को ज़िंदा ओ जावेद कर दिया है......आखिरी मर्तबा पीछे मुड़कर देखने के बाद फिर एक दूसरे में खोये दोनों अपने अंतहीन रास्ते पर आगे बढ़ जाते हैं......

~इमरान~

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

मंदिर वहीँ बनायेंगे

सुन ले ओ भगवन,
ओ सबसे बलवान,
वही पुरानी तान,
फिर अयोध्या आएंगे
मन्दिर वहीँ बनाएंगे,
तारीख़ नहीं बताएँगे,
आंदोलन करवाएंगे,
अदालतें बिठवायेंगे,
हम दंगे करवाएंगे,
चुनाव जीते जायेंगे,
चन्दा जमा करवाएंगे,
महल अपने बनवायेंगे,
टाइल्स विदेशी लगवाएंगे,
खूब शिलाएं लाएंगे,
उनसे अपने मकां बनवाएंगे,
तुम चिंतित बिलकुल मत होना,
तम्बू में आराम से सोना,
टाट का ले लेना बिछौना,
बिन बिजली अँधेरे में जीना,
दूध नहीं है पानी पीना,
हम तो संसद बसाएंगे,
मंत्री बने बनाएंगे,
दिल्ली में छा जाएंगे,
काला धन न लाएंगे,
मुर्ख जनता को बनाएंगे,
तुम शांति से प्रतीक्षा करो,
मायूसी पे न कान धरो,
ये काम तो निपटा लें पहले,
तिजोरियां खाली हो गयीं फिर,
इनको तो भर लें हम पहले,
बाद में तेरी सोचेंगे,
तब तक ये आश्वासन ले लो,
उम्मीद का एक वादा ले लो,
अच्छे दिन की आसा ले लो,
मन में तुम भी सपना रख लो,
दिल से कहते हैं ये बात
फिर एक बार फिर एक बार,
सुन लो मेरी जान लला,
जनमन के भगवान लला
ओ रामलला हम आएंगे,
मंदिर वहीँ बनाएंगे....

~इमरान~