शनिवार, 11 जुलाई 2015

जंग ए इश्क़

ना जंग ए इश्क़ में तलवार लेके हम उतरे
जिरह कोई न थी न ढाल लेके हम उतरे

चले जो सू ए मैदां तो शहसवार भी न थे
सिपाह भी साथ न थी कोई सालार भी न थे

सामने कोई लश्कर नहीं था वो अकेला था
वो मेरी जान का दुश्मन हसीं बला का था

हुआ जो वार था पहला वो उसकी जानिब से
नज़र का तीर चलाया था दिल के राकिब ने

आके सीने पे सही सिम्त वार लग ही गया
वो पहले वार में फैसला ए जंग कर ही गया

गिरे ज़मी पे तो आँखों में इक अन्धेर सा था
खुली जब आँख तो सर उनके ज़ानू पा था

मुस्कुरा के वो बोले हो जाना मुबारकबाद तुम्हें
हार के मुझसे मिला है लक़ब ए ग़ाज़ी तुम्हें

~इमरान~


गुरुवार, 9 जुलाई 2015

मदरसों में आधुनिक शिक्षा की आवश्यकता

शिक्षण संस्थान का दर्जा दूर की बात ....मेरे ख्याल से जिन मदरसों में विज्ञान कंप्यूटर और गणित नहीं पढ़ाये जाते उन्हें बन्द ही हो जाना चाहिए ....
साल 2015 में आप 1400 साल पहले लिखी गयी किताबें और कहीं काम न आने वाली बेमसरफ ज़बाने (अरबी/उर्दू) पढ़ाकर उन्हें कार्टूनों जैसे लिबास और वेशभूषा देकर अपने बच्चों को आखिर एलियन क्यों बनाना चाहते हैं....

माना की मदरसों में तालीम पाने वाले बच्चे ज़्यादातर ऐसे गरीब वर्गों से आते हैं जहाँ उनके पास दो वक़्त की रोटी बमुश्किल जुट पाती है , फिर ऐसी स्थिति में तो मदरसों में आधुनिक शिक्षा का महत्व और भी ज़्यादा हो जाता है....
ठीक है बच्चों के ज़ेहन में अपना अपने धर्म मज़हब रिलिजन रुपी गलाज़त घुसाये बिना आप भारतीय परिवारों में परवरिश ही अधूरी मानी जाती है , कम से कम साथ में आधुनिक शिक्षा भी दी जायेगी तो उनमे एक नज़रिया तो पैदा होगा....इसपर पेटदर्द क्यों ?

जो काम महाराष्ट्र की सरकार ने किया है वो इस मुल्क के मुसलमानो को बहुत पहले ही कर देना चाहिए था । खुद समूहों में जाकर मदरसों के संचालकों पर दबाव बनाकर उन संस्थाओं में आधुनिक शिक्षा शुरू करवाने को कहना चाहिए था ।
बाक़ी तो जब तक यह पूंजीवादी व्यवस्था मौजूद है,किसी भी हालत में पूरा देश समान रूप से शिक्षित नहीं हो सकता ...... साक्षर भले से हो जाये ।

सोमवार, 6 जुलाई 2015

आज की रात


गुज़र रही है कुछ

शबो की मानंद

अकेली तन्हा 

और उदास सी

मेरे कमरे की 

छतों को तकती

मेज़ पर पड़ी इस 

बेजान डायरी में

ज़िंदा हरुफ़ तलाशने की

नाकाम सी कोशिश करती

बीत ही रही है

तुम्हारे सिवा

फ़क़त इस एक 

पुरअम्न आसरे पर

कि शायद कल

तुम मेरे साथ रहो

लेकिन ये आज की रात

लेकिन.....

ये आज की रात.....


~इमरान~.

रविवार, 14 जून 2015

सूखे आंसू

आँखों से निकलते हैं
सूखे आंसू अक्सर
और इन
सूखे आंसुओ में
होता है कई
मलाल हमेशा
मलाल किसी को
समझ न पाने का
तो कभी
समझ के भी
दूर चले जाने का
दर्द करता रहता है
तवाफ़ मेरा अक्सर
लेकिन मक़ाम इसका
मुझे होता नही मालूम
गिले शिकवे भी
रहते हैं इनमे
कसरत से
कुल मिलाके
नज़ारा खुद के ये
आईने का होता है
ये आइना भी
ज़रूरी है देखना इतना
बगैर देखे इसके
निकल सकते नही
बाहर घर के

~इमरान~

मंगलवार, 9 जून 2015

ग़ालिब फिर भी ग़ालिब ही रहे


बहुत कम लोग यह बात जानते हैं कि मिर्ज़ा असदुल्लाह खां उर्फ़ "ग़ालिब" घोर अन्धविश्वासी भी थे ,अपनी बीमारी और बुढापे से तंग उर्दू फ़ारसी का यह अज़ीम शायर समय समय पर अपनी मौत की तारीख़ "मुर्द ए ग़ालिब" निकाला करता था, एक बार ऐसे ही उन्होंने अपनी मौत की तारिख निकाली,
इस नयी तारिख को देख उनके एक शागिर्द "जवाहर सिंह जौहर" ने कहा -"हज़रत,परवरदिगार ने चाहा तो यह माद्दा भी ग़लत साबित होगा"-
इसके पहले भी उनकी निकली कई तारीखें गलत साबित हो चुकी थीं,जौहर की बात सुनकर ग़ालिब बोले-"देखो साहब तुम ऐसी बद फाल (अपशकुन) मुंह से ना निकालो , अगर यह माद्दा ए तारीख भी गलत साबित हुआ तो मैं सर फोड़ के मर जाऊंगा"....
मिर्ज़ा ग़ालिब और बदकिस्मती दोनों हमेशा साथ-साथ चला किए,रईस घराने में पैदा हुए असद पर एक वक़्त वो भी आया जब पूरी पेंशन न मिलने के कारण उन्हें मुफलिसी में गुजर-बसर करना पड़ी, जिंदगी के सुनहरे दिनों में भी वो सिर से पांव तक कर्ज में डूबे रहे, रोज-ब-रोज दरवाजे पर कर्जख्वाहों के तकाज़े मिर्ज़ा और उनकी बेगम को परेशान करते रहे, एक वक्त ऐसा भी आया जब मिर्ज़ा के खिलाफ अदालती डिक्रियां निकलने लगी, इन सब वजहों से उनका जीवन हमेशा तनावों से घिरता रहा, मगर क्या मजाल थी कि इस महानतम फनकार को अपने फन से कोई दुनियावी तकलीफ जुदा कर पाती, यहां तक कि इन सब तनावो के बीच मिर्जा गालिब अपने नन्हें-नन्हें बच्चों को फौत होते देखते रहे और अंदर ही अंदर रोते रहे,
उनकी कलम से निकला यह शेर हकीकत में उनकी ज़िन्दगी की साफ़ तस्वीर पेश करता है...
(1)मेरी किस्मत में ग़म अगर इतना था,
दिल भी या रब कई दिये होते...
(2)ज़िन्दगी अपनी इस शक्ल से गुजरी ग़ालिब
हम भी क्या याद करेंगे की खुदा रखते थे
ग़ालिब के सात बच्चे हुए पर कोई भी पंद्रह महीने से ज्यादा जीवित न रहा. उनकी पत्नी की बड़ी बहन को दो बच्चे Kहुए जिनमें से एक ज़ैनुल आब्दीनखाँ को ग़ालिब ने गोद ले लिया था.
वह बहुत अच्छे कवि थे और 'आरिफ' उपनाम रखते थे. ग़ालिब उन्हें बहुत प्यार करते थे और उन्हें 'राहते-रूहे-नातवाँ' (दुर्बल आत्मा की शांति) कहते थे. दुर्भाग्य से वह भी भरी जवानी(36 साल की उम्र) में मर गये. ग़ालिब के दिल पर ऐसी चोट लगी कि जिंदगी में उनका दल फिर कभी न उभरा. इस घटना से व्यथित होकर उन्होंने जो ग़ज़ल लिखी उसके कुछ शेर :
लाजिम था कि देखो मेरा रस्ता कोई दिन और,
तनहा गये क्यों अब रहो तनहा कोई दिन और ,
आये हो कल और आज ही कहते हो कि जाऊँ,
माना कि नहीं आज से अच्छा कोई दिन और,
जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे,
क्या खूब क़यामत का है गोया कोई दिन और

तुम बिलकुल उर्दू जुबां सी हो

तुम बिलकुल
उर्दू ज़ुबाँ सी हो
की तुम्हारे
होंटो में शीरीनी,
आँखों में शबनम
और हाथों में लम्स,
सीने पर राहत
और दिल में अमन,
और उस अम्न में,
मैं बसा करता हूँ,
कि तुममे बसने से ,
मक़सद मिला करता है,
बिलकुल उर्दू ज़ुबाँ सा,
एहसास हुआ जाता है,
एहसास जिसमें डूब कर,
उतर जाने से,
रूह ए नातवां को,
राहत सी मिला करती है,
दिल ए बे गुमां को,
एक गुमां हो जाता है,
गुमाँ जो,
सच जैसा है,
दरअसल सच ही तो है,
कि तुम
ज़िन्दगी हो मेरी,
ज़िन्दगी जो
बसती है मुझमे,
जो मेरे वजूद में
जिया करती है,,
उर्दू की तरह
इठलाती सी,
सिमट जाया करती है,
वजूद में मेरे


~इमरान~

दिल की आवाज़ का जवाब

मेरे दिल की
आवाज़ का जवाब
हर बार जो
पलट आती थी
कहीं किसी 
निर्वात से टकराती
लौट आया करती थी
तनहा अकेली सी
इस बार वो आई है
मय इक जवाब के
जवाब की शक्ल में
एक मुस्कुराता चेहरा
एक जोड़ी मासूम आँखें
और इक प्यारा
अपना सा लगता
हंसीं वजूद लेकर
आवाज़ पलटी तो है
वो लौटी भी है
इस बार मगर
तन्हा नहीं
मेरे दिल के लिए
आई है वो
अमन लेकर.....
~इमरान~

हेलमेट और मेरी आपबीती

लगभग 4 साल पहले की बात है,मैं अपनी बजाज सीटी हंड्रेड मोटरसाइकिल पर लखनऊ से वापस जौनपुर आ रहा था ।
आमतौर पर मैं हेलमेट का प्रयोग नही करता, जौनपुर से लखनऊ जाते वक़्त भी पूरे रास्ते बिना हेलमेट के ही गया था लेकिन वापसी चूँकि शाम की थी और पहुँचते पहुँचते रात हो जानी थी अतः कुछ सोचकर वहीं रास्ते से एक हेलमेट खरीदी और पहन ही ली ।
4 बजे लखनऊ से जौनपुर के लिये निकला और 6 या 6:30 पर सुल्तानपुर रोड तक पहुँच गया था, अब तक हल्का हल्का अँधेरा हो चला था ।
उसी रोड पर एक ढाबे से थोडा आगे काफी गिट्टी बिछी हुई थी और मैं लगभग 70-80 की स्पीड में था, किस्सा मुख़्तसर यह कि मोटरसाइकिल के अगले पहिए के नीचे कमबख्त एक गिट्टी कहीं से आ धमकी और मुझे पता ही नही चला कि कब गाडी मुझे लेकर दायीं तरफ गिर गयी ,कुछ एक दो मिनट में ही बेहोश हो गया था ।
आँख अस्पताल में खुली, दायें कन्धे की कॉलर बोन तीन जगह से टूट चुकी थी,उसकी हड्डी खाल को चीर कर बाहर झाँक रही थी,बाक़ी शरीर पर भी मामूली चोटें आयीं थीं ।
तीन दिन बाद आपरेशन हुआ...हड्डी में ड्रिलिंग करके चार एक्सटर्नल स्पोर्ट लगाये गए जो पूरे एक महीने तक लगे रहे ।
इस घटना के लगभग एक हफ्ते बाद बाद दादा ने मुझे मेरा हेलमेट दिखाया जिसके बींचोबीच एक लम्बा सा लेकिन हल्का क्रैक पड़ा हुआ था।
एक्सीडेंट की खबर सुन अगले दिन ही दुबई से सीधे लखनऊ उतर आये चाचा पास ही खड़े थे,उनके कहे शब्द आज भी याद हैं-
" इसे देख रहे हो बेटा?ये अगर न होती तुम्हारे सर पे....तो जानते हो इसकी जगह कहाँ पर क्रैक आता?"
~इमरान~