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सोमवार, 25 मई 2015

डॉक्टर इंजिनियर कैसे बनते हैं?

हमेशा की तरह आज भी वो चिल्ड बियर एन्ड इंग्लिश वाइन शॉप से दो बियर के कैन लेकर के बगल वाली गली में बिल्डिंग के चबूतरे पर ही जा बैठा था....
कैन खोल कर पहला घूँट लगाया ही था की बगल में बैठे एक दूसरे बेवड़े को किसी छोटे लड़के ने सिगरेट की इक डिब्बी और छुट्टा पैसे ला कर थमा दिए,आज इस लड़के की शक्ल कुछ बदली सी लग रही थी...
ये शायद आज उसका बड़ा भाई था "ड्यूटी" पर या कोई दुसरा बच्चा था....
उसने छोटे लड़के को पास बुलाया और जेब से सौ का नोट निकाल कर उसे थमाया, लड़का इक पल को सवालिया निगाहों से उसे देखता रहा... आखिर पूछ ही लिया-

"कौन चीज? सिगरेट लाएं या नमकीन?"

नही सिगरेट है मेरे पास....इसे तुम रख लो ये तुम्हारे लिए है....

लड़का इक पल को भौंचक सा वो नोट देखता रहा.... फिर उसे जेब में डालकर ख़ुशी से उछल कर अपनी साइकिल की जानिब बढ़ने लगा...

आवाज़ देकर रोका...."बैठा राजू जावत कहाँ है"

"जी भईया बोला"

कहाँ रहते हो?मकनवा किधर है?

सिपाह की तरफ

यहां का करने आते हो

सीसीयां बीनने

अच्छा अब्बा का करते हैं?

उ बक्सा बनाते हैं

बढ़ई हैं?

ई नही मालम,बस उ बक्सा कुर्सी बनावते हैं

पढ़ते हो?

हाँ मदर आयसा में

कौन क्लास में हो?

पांचवी में भैया

एन्ड व्हाट आर योर सब्जेक्ट्स?

का???

क्या क्या पढ़ते हो? सब्जेक्ट बताओ

हिंदी अंग्रेजी गणित भूगोल नैतिक शिक्षा....

अच्छा इन बोतलों का क्या करते हो?

भंगार वाले को बेच देते हैं... फिर गुल्लक में डाल देते हैं पैसवा....

फिर जब गुल्लक भर जाता है तो अब्बा ले लेते हैं?

नहीईई....हम कपड़े खरीदते हैं....(छोटी साईकिल पर बैठते हुए) देखिए ई साइकिल भी अईसे ही खरीदे रहे...

अरे वाह.... अच्छा तुम बड़े होकर क्या बनोगे?

हम अब्बा से ज़्यादा अच्छे वाले बक्से बनाएंगे...

डॉक्टर,इंजिनियर नही बनोगे?

वो कैसे बनते हैं?

लड़के के इस सवाल ने उसका नशा हिरन कर दिया ता
लाजवाबी के आलम में बात पलटते हुए उसने कहा

अच्छा तुम्हारा नाम क्या है?

हमरा नाम पप्पू....नानी लेकिन हमें मुन्ना ही कहत हीं..

पैडल मरते हुए लड़का आगे बढ़ गया था.... उसने बियर का दूसरा कैन खोला....पहले वाले का नशा हवा हो चुका था...आज तीसरा खरीदना पड़ा उसे...

~इमरान~

सोमवार, 11 मई 2015

क़ुदरत की शिकायत

क्या आपको लगता है प्रकृति अपनी असीम देनों के लिए हमसे कभी शिकायत नही करती? शायद आपसे न करती हो...लेकिन मुझसे तो अक्सर करती है.....

कल सारी रात बूँद ने मुझसे हम सबकी शिकायत की है....धरती पर आते आते उसका मन उचाट हो रहा था....उसका मन था कि बादल के दामन में ही रह जाये वो....भला धरती पर जाए भी तो आखिर किस मक़सद से?..... किस उम्मीद से?

क्या धरती पर मौजूद उन खून की बूंदों को धोने के लिए जो तुम आये दिन बहाया करते हो? क्या उन आंसुओं में मिल जाने के लिए जो तुम उन आँखों को दिया करते हो जो रात दिन अपनी मेहनत से तुम्हारे महल खड़े किया करते हैं?....

नहीं....ये बूँद तो चली थी ज़मीन को एक नया सृजन देने..... नए जन्म देने के लिए...नए जीवन का संदेसा लेकर.... लेकिन तुमने उसे कैसी जगह दी.....गैर बराबरी की जगह....जहाँ इंसान को इंसान उसकी आदमियत से नही बल्कि मालियत ओ मिलकियत से समझा जाता है....


उसका तो मन था कि वो बादल के पास वापस लौट जाये....ऊंचाई से इतनी हसीन दिखने वाली तुम्हारी ये सजीली सी दुनिया उसे नज़दीक आते आते कितनी डरावनी सी लगने लगी की एक बार तो उसने तुम्हारे पास आने का इरादा ही तर्क कर दिया था....फिर बादल ने उसे संभाला

काश तुमने सूना होता....बूँद बादल से क्या कहती है....उसके लफ्ज़ तुम्हारे कानों में पड़े होते तो तुम भी सुनते....कि उसने बादल से कहा....
अये मेरे अज़ीज़...ये तुम मुझे किस तरफ भेजते हो...ये भला मेरा किस तरह इस्तेकबाल करेंगे....खून के धब्बे धुलने के लिए?....मेरे पनाह देने वाले बादल....मुझे इनके बदले बेहतर लोग दे और इन्हें मेरे बदले बुरी नेमतें आता कर.....
लेकिन बादल तो फिर बादल था.... उसे समझाता है....तू ठीक कहती है.... लेकिन ज़रा उन आंसुओं से भरे चेहरों की भी तो सोच...जो तेरी आमद के ना जाने कब से मुन्तज़िर हैं...जाकर उनके आंसुओं को कौन पोछेगा जो तू हिम्मत हार गयी तो....ज़मीन का सीना चीर कर दुनिया के पेट भरने का इंतज़ाम करने वाले तेरे इंतज़ार में पलक पावड़े बिछाए कब से तेरी बिरहा के गीत गा रहे हैं....इन्हें देख तो सही....तेरे सिवा कौन इनकी तकलीफ दूर कर सकेगा....मुझे बता उसका पता फिर मैं उसी को भेज देता हूँ....

बूँद ने अनमने भाव से एक बार फिर नीचे देखा...
उसके चेहरे पर विस्मय का एक भाव आया और अचानक खिलते फूल की कली जैसी मुस्कान ने उस भाव को अपनी अंजुली में भर कर कहीं छुपा सा लिया....
बादल को आखिरी बार मुस्कुराते हुए आँख में आंसू भरके उसे अंतिम अलविदा बोल वो सीधे उन आंसुओं वाले चेहरों की जानिब बढ़ चली..

मुझको कागज़ की खुशबु भी बड़ी रूमानी लगती है....इसमें से इश्क़ की बू आती है....क़ुरबानी की गन्ध होती है इसमें....उन हज़ारों ज़िन्दगियों की क़ुरबानी जो खामोश ही सही लेकिन बिलआखिर हुआ तो ज़िंदगियाँ ही करती हैं.....ऐसा लगता है मानो इनमे से कोई ज़िन्दगी आवाज़ दे रहा हो....हमसे कुछ कहना चाहती हो....कि देखो हमारी क़ुरबानी की लाज रख लेना...हमने अपना जिस्म देकर तुम्हें ये कागज़ बख्शा है.....इसपर ऐसे लफ्ज़ ही लिखना जिनसे दुनिया बेहतरी की जानिब गामज़न हो सके....

देखो हमारे जिस्म के टुकड़े काट कर जो वरक़ बनाते हो,अपने आराम के लिए जो ये हमारा क़त्ल करते हो, इनसे तुम नफ़रतें मत फैलाया करो तो कितना अच्छा हो...इनको प्यार मुहबत का ज़रिया बनाओ....हदें तोड़ो नई सीमायें न क़ायम कर लिया करो तो कितना बेहतर हो....तल्खियों के बीज क्यों बो देते हो इनके ज़रिये....हमारे बलिदान को शर्मिन्दा क्यों कर देते हो.....

लगातार मेरे कानों में ये बेजान कागज़ फुसफुसाया करता है और फिर मैं वाक़ई बेक़सूर बेगुनाह होते हुए भी शर्मिन्दा हो जाता हूँ....

क्योंकि उस वक़्त उस शिकायती आवाज़ के सामने मैं....महज़ मैं इमरान रिज़वी नहीं खड़ा होता....उसके सामने खड़ा होता है इक इंसान....जिसे जवाबदेह बनाया जा रहा होता है और जिससे शिकवा किया जा रहा होता है पूरी इंसानी ज़ात के खराब कर्मों के लिए....और फिर मैं......मैं लाजवाब होकर दरख़्त के क़दमों में गिर जाता हूँ....फ़क़त इतना कहकर...हमें माफ़ कर देना....हम नहीं जानते हम क्या कर रहे हैं.....

लिखने का मक़सद यह है कि यह प्रकृति ने मानव जाति को कितने तोहफे दे रखे हैं....जो हम इनका सदुपयोग करना सीख सकते तो कितना अच्छा होता...

काश हमने इन तोहफों का उपयोग धरती को रहने लायक एक बेहतर जगह बनाने के साधन के रूप में किया होता...लेकिन नहीं....हम तो मगरूर हैं खुद के प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना होने के दम्भ में....

पता नहीं यह गुमान इंसान को कब हुआ...की वो सर्वश्रेष्ठ है.....पता नहीं इस गुमान के चलते दुनिया को हमने कब बद से बदतर करना शुरू कर दिया....पता नहीं इस गुमान से हम बाहर कब निकलेंगे....जब निकलेंगे तब तक हमारे पास रखने को कुछ बचेगा भी या नहीं.....भविष्य के गर्भ में हमने किन बीजों का रोपण किया है और उससे क्या पैदा होने वाला है....प्रकृति के सब्र का बांध जिस दिन टूट गया उस दिन क्या होगा?

बस... यही सोच कर अक्सर मन कांप उठता है.....

~इमरान~

ज़िन्दगी ढोवत हैं साहब

शाम ढल जाना चाहती थी...,सूरज, सफेद से लाल हो चला था...एक बूढा भिश्ती अपनी पीठ पर दो पानी के मश्क लादे धीमी गति से कहीं चला जा रहा था.....
रास्ते में एक शानदार हवेली पड़ती थी...उस आलीशान ईमारत के सामने एक लगभग पचास बरस का शख्स अपने पन्द्रह बरस के बच्चे के साथ खड़ा हुआ था...
बाप बेटे में कुछ बातचीत चल रही थी कि उसी वक़्त हवेली के अंदर से बच्चे का चचा बाहर निकला और दोनों भाइयों में किसी अहम मामले को लेकर गुफ्तगू होने लगी...
इस दौरान छोटा लड़का बाहर रास्ते पर लोगों को आते जाते देखने लगा...उस की नज़र सामने से पीठ पर पानी की दो मश्क लादे जा रहे एक भिश्ती पर पड़ी...बच्चे ने रौबीले से अंदाज़ ओ लहजे में बूढ़े से पूछा-
ये क्या ढोकर ले जाते हो?

"जिन्दगी ढोवत हैं मियां साहब...."

इतना भर कह वो बूढा आगे बढ़ गया.... बच्चे का चचा अब वापस जा चुका था.... वो फ़ौरन भागा भागा अपने बाप के पास गया और पुछा-

"अब्बा, ये सामने देखें.. जो बूढा जा रहा है ये कौन है?

हाँ बेटा,ये भिश्ती होते हैं,

और ये क्या सामान ढोते हैं?

ये पानी पहुंचाते हैं सब जगह...अभी भी अपनी पीठ पर लदी मशक में ये पानी ढोकर ले जा रहा है

फिर उसने मुझसे ये क्यों कहा की वो ज़िन्दगी ढोता है?

इस सवाल ने बाप के चेहरे की मुस्कराहट खत्म कर दी थी.....लहजे में नरमी को खत्म करके और बिना सख्ती लाये उसने बेटे को जवाब दिया...

"बेटा...पानी को ज़िन्दगी इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसके बिना हम ज़िंदा नही रह सकते....इसीलिए उसने तुमसे कह दिया कि वो ज़िन्दगी यानी पानी ढोता है....चलो अब मगरिब का वक़्त हो चला है अज़ान होने वाली है, तुम अंदर जाओ और नमाज़ की तयारी करो...मैं भी आता हूँ..

बच्चा जिज्ञासू था..... उसने फिर पूछा- लेकिन अब्बा वो सीधे सीधे यह भी तो कह सकता था की वो पानी ले जा रहा है...उसने ज़िन्दगी ही क्यों कहा?

बच्चे मन की जिज्ञासा तो अभी बाकी थी  लेकिन बाप के सब्र का बाँध टूट चुका था....बेटे को झिड़क कर अंदर भेज दिया...

लेकिन भिश्ती के पानी ढोने और ज़िन्दगी ढोने के दरमियान का फर्क और उसके जवाब के पीछे का दर्द उस बाप में कहीं मौजूद इंसान के अंदर अंदर अजीब सी शर्मिंदगी पैदा करने लगा था...

उस बूढ़े की मुस्कुराती आँखों और सौम्य जवाब की वजह से उसके बेटे के बालमन में जागा सवालों और जज़्बातों का तूफ़ान और उन सवालों के पूछते वक़्त बेटे की आँखों में उस बूढ़े के लिए अजब सी मुहब्बत और अब्बा के जवाबों का कौतुहल और फिर आखिर में उसका अपने बेटे को झिड़क कर अंदर भगा देना और इस झिड़कने से बेटे की आँख से गिरी आंसू की बूँद........!!!

ये सब मिलकर उसके ज़ेहन में एक अजीब सी हलचल पैदा करने लगे थे....ये हलचल किसी तूफान में बदलती उसके पहले ही अज़ान की आवाज़ आ गई,बच्चा वज़ू बनाये नमाज़ के लिए तैयार बाहर आ चुका था, उसकी आँखों में बूढ़े की तैरती शक्ल, बाप की डांट का खौफ और अंतर्मन की बाकी रह गयी जिज्ञासा और बेजवाब रह गए सवालों का मिला जुला भाव (जिसके लिए आप जो मुनासिब समझें लफ्ज़ चुन लें,अभी मेरे पास वो लफ्ज़ नही हैं,जब आएगा तो बता दूंगा...) अभी भी मौजूद था......

बाप ने बेटे की आँखों में देखना चाहा तो ज़रूर , लेकिन आँख न मिला  पा रहा था...
बहरहाल....दोनों ने मस्जिद का रुख किया....लेकिन पता नही क्यों बार बार वो शख्स मुड़कर अपनी हवेली के फाटक की तरफ देखता.....इधर अज़ान अपने आखिरी चरण में पहुँच चुकी थी..., अपने ज़ेहन के ख्यालों के बवंडर को उसने एक मर्तबा झटक के बाहर फेंकने की कामयाब या नाकाम सी कोशिश की और क़दमों में तेज़ी लाते हुए मस्जिद की जानिब बढ़ चला....

दरअसल..... उसे अपने घर की आलिशान दीवारों से खून टपकता नज़र आने लगा था....

~इमरान~

रविवार, 26 अप्रैल 2015

आखिर उल्लू कौन ?

पता नही उल्लू का नाम उल्लू किसने रखा होगा,रखा भी तो यह नाम आगे चलकर मूर्खता का प्रतीक कैसे बन गया...लेकिन मुझे तो यह एक बेहद शानदार और खूबसूरत परिंदा लगता है । मेरे घर में अक्सर मुंडेरों पर छत पर या बगीचे में कभी कभी दिख जाया करता है... इसका अन्य परिंदों की तुलना में बड़ा और भारी शरीर, तीखी नुकीली चोंच,रहस्यमयी आँखें मुझे बहुत आकर्षित करती हैं ।

अगर अपने कभी इस जानवर को नज़दीक से देखा हो तो आप खुद इसकी सुंदरता की तारीफ किये बिना नही रह सकेंगे । क़ुदरत के इस नायाब नमूने को उड़ते हुए देखना तो अलग ही अनुभव होता है...यह बिलकुल धीमे और एक शाही से अंदाज़ में उड़ता है और उस वक़्त यह बेहद कम बार ही पंख फड़फड़ाता है ।

लेकिन बदकिस्मती ! अन्धविश्वास के धनी हमारे देश में इस सुंदर जीव को "मनहूस" समझा जाता है और इसकी घर में या आसपास मौजूदगी को कई जगह अशुभ माना जाता है जिसके चलते लोग अक्सर इसे मार भी देते हैं या इसका आशियाना उजाड़ देते हैं ।

विदेशों में तो कई जगह लोग इसे बाक़ायदा अपने घरों में पालते हैं और प्रशिक्षित भी किया जाता है । ठीक उसी तरह जैसे भारत में लोग शिकरे (यानि बाज़) को पालते और प्रशिक्षित करते हैं, लेकिन जैसा की मैंने देखा उसे पालने और ट्रेन करने की जो विधि है वो बड़ी क्रूर और पीड़ादायक होती है।

पहले तो इस पक्षी को पकड़ कर किसी पिंजरे में बन्द कर दिया जाता है और फिर कोई नशीली दवा खिलाकर इसे मूर्छित कर देते हैं,उसके बाद जो होता है उसे पढ़कर आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे ,इसकी दोनों आँखों को पलको से आपस में मिलाकर सुई से बाक़ायदा सिलाई कर दी जाती है, तत्पश्चात पंद्रह बीस दिनों तक हाथ पे एक मोटे चमड़े का दास्ताना पहनकर इसे बांह पर बैठने का अभ्यास कराया जाता है, इस दौरान इसे नशे का हल्का डोज़ लगातार देते रहते हैं जिससे इसकी आक्रामकता कम हो जाये और यह पालतू बन जाये । फिर कुछ वक़्त बाद पलकों की सिलाई भी खोल दी जाती है ।

विलुप्त होता देख इसके संरक्षण के लिए राज्य द्वारा कानून ज़रूर बनाये गए लेकिन कहीं कहीं चोरी छिपे यह क्रूर हरकतें अभी भी देखने को मिल जाती हैं । लखनऊ में मैंने खुद अपनी आँखों से कई बार शिकरे और उल्लू को प्रशिक्षित करते हुए देखा है ।
तब मैं सोचता था बाज़ को यह कितना सालता होगा कि उल्लू कितना खुशनसीब है उसे कुछ जगहों पर मनहूस या अशुभ  मानकर लोग छूते नही,
लेकिन शौक़ीन मिजाजों ने अपने शौक़ की पूर्ती के लिए जिस तरह बेदर्दी से इन शानदार और खूबसूरत जानवरों को जो ताबड़तोड़ नुकसान पहुंचाए हैं उसका नतीजा यह है कि आज शिकरा तो विलुप्ति की कगार पर पहुँच गया है और दिखाई ही नही पड़ता,
मुझे याद है की आखिरी बार मैंने बाज़ तब देखा था जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था,तब से आजतक यह चिड़िया कहीं स्वछंद विचरण करती नज़र नही आई....आपको याद हो तो बताएं...
हालाँकि ज़्यादा बड़ी वजह इनके विलुप्तिकरण की पर्यावरण से जुडी है (उसके मूल में भी इंसानी करामात हैं), लेकिन इनकी विलुप्ति के सहायक कारणों में से इन्हें पालतू बनाने और इनके शिकार का इंसानी पागलपन भी है ।
अक्सर सोचता हूँ कि अगर जानवरों में भी शुभ अशुभ जैसी कोई मान्यता होती होगी तो निःसंदेह उनके अनुसार इस दुनिया का सबसे मनहूस जानवर इंसान ही ठहरता होगा ।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

भूत बिल्ली

अन्धेरा बढ़ चला है और इस वक़्त इस मेरे घर के इस विशाल आँगन में लगी सारी सोडियम लाइट्स रौशन होकर किसी दिन का सा मंज़र पैदा कर देती हैं...
दरमियान में खिली रात की रानी में मौसम के चलते कुछ गिने चुने ही आ सके फूलों पर पड़ती इनकी तेज़ रौशनी लगता है मानो कई नन्हे सितारों पर रौशन सूरज अपनी छटा बिखेर रहा है.....

मैं इसी दरख्त के पास आरामकुर्सी पड़ी पाकर बैठ गया था,कुछ देर में चाय भी मिल गयी, अम्मी को पता होता है कि यह मेरी चाय का वक़्त है,लिहाज़ा बिन कहे मिल जाया करती है, सामने छत की मुंडेर पर कहीं से दो फख्ताएं आकर बैठी हुई थीं, अमूमन परिंदे इस वक़्त अपने अपने घोंसलों में आराम कर रहे होते हैं लेकिन ना जाने क्यों यह जोड़ा अभी तक बाहर ही मौजूद था और छत की मुंडेर पर आके बैठ गया था, अपनी आवाज़ में चहचहाते हुए, फाख्ता की आवाज़ बिलकुल ऐसी होती है जैसे किसी इंसान की हंसी, इसलिए इसे लाफिंग डोव भी कहा जाता है...

पुराने ज़माने में जब शाम ढ़ले किसी सुनसान जगह पर झुण्ड में फख्ताएं बोलतीं थीं तो लोगों को अक्सर भूत प्रेत का भ्रम हो जाया करता था,मुहल्ले के आसपास के बड़े बूढ़े कई किस्से भी सुनाया करते ,

जैसे एक किस्सा किसी खूबसूरत औरत का था जो ज़ोर ज़ोर से हंसा करती थी,उसकी आवाज़ उसके पड़ोस में रहने वाले एक पहुंचे हुए बाबा को परेशान करती और उनकी इबादत में खलल पड़ता,औरतों की आवाज़ घर से बाहर नही आना चाहिए लिहाज़ा एक दिन उस बाबा ने नाराज़ होकर उस औरत को परिंदा बना दिया...
बचपन में हम समझ न पाते की खूबसूरत औरत के हसने की आवाज़ का इबादत में खलल से क्या ताल्लुक़ था... अगर वो औरत ज़ोर से हसती थी तो उस बाबा को इससे क्या दिक़्क़त हो सकती थी और अगर औरत की आवाज़ घर के बाहर आ जाये तो इससे मआशरे को क्या नुकसान हो सकता था...घरों में पली गाय भैंसे जब रंभाती हैं तो उनकी आवाज़ दूर तक गूंजा करती है... उससे किसी को कोई एतेराज़ न होती लेकिन घर में रहने वाली औरत की आवाज़ अगर बाहर चली जाए तो मज़हब पर खतरा मंडराने लगता है...बहरहाल हमारा बालमन उस वक़्त तक यह अजीब सा लॉजिक समझ नहीं पाता और न कभी हमारे घर में इस तरह का माहौल होने के चलते इसपर कभी बड़ों के मुंह से कोई चर्चा सुनने को मिलती कि इसके पीछे क्या तर्क हो सकता था...लिहाज़ा बचपन की कई पहेलियों की तरह ये पहेली भी अनसुलझी रह गयी...

हाँ लेकिन इस भूत प्रेत के भ्रम के लिए फाख्ता अकेली ज़िम्मेवार नहीं है,अक्सर कुछ अजीब हालात भी इसके लिए ज़िम्मेदार होते हैं... कैसे ? वो मैं बताता हूँ, ये तक़रीबन बारह साल क़ब्ल की बात है, वेस्ट इंडीज में कोई सीरीज चल रही थी, इंडिया सेमिफाइनल तक पहुँच चुकी थी,उस वक़्त तक मैच फिक्सिंग जैसे केस सामने नही आये थे लिहाज़ा हमारी क्रिकेट में रूचि बनी हुई थी, अम्मी तो सो चुकी थी लेकिन हम और पापा जाग रहे थे, रात का लगभग एक बजा था और चाय का तीसरा दौर चल रहा था । तभी अचानक दरवाज़े पर धड़ धड़ की आवाज़ सुनाई दी, जैसे बाहर से कोई दरवाज़े पर ज़ोर ज़ोर से हाथ मार रहा हो, पापा और मैं चौंके , इस वक़्त इतनी रात को कौन हो सकता है...

हालांकी पापा के सक्रीय राजनिति में होने के चलते अक्सर रात बिरात लोगों का आना जाना होता रहता था लेकिन फिर दरवाज़े के बाहर कॉल बेल लगी हुई थी, और दरवाज़ा पीटने का अंदाज़ भी कुछ अजीब सा था....मैंने दरवाज़ा खोलकर देखना चाहा कि कौन है लेकिन पापा ने रोक दिया...वो खुद गए और पहले दरवाज़ा खोलने के बजाए मैजिक ऑय से देखना चाहा की कौन है...लेकिन सामने कोई नज़र ना आया...मैंने भी झाँका लेकिन सामने बल्ब की तेज़ रौशनी होने के बावजूद कोई नज़र ना आता था...

हम बाप बेटे दोनों अंधविश्वास से सख्त चिढ़ते थे लेकिन फिर भी उस रात बड़ी अजीब स्थिति पैदा हो गयी थी...यानी दरवाज़ा रह रह कर धड़ धड़ बोल रहा था लेकिन सामने कोई दिखाई ना देता था...हम दोनों अब्बा बेटे क्रिकेट भूल कर एक दूसरे को ताक रहे थे कि अब क्या किया जाये...दरवाज़े की आवाज़ में कोई फर्क न था और रह रह कर थोड़ी थोड़ी देर पर आवाज़ आये जाती थी...

पापा ने दरवाज़े के पास लगी खिड़की खोली,और उससे झांक कर देखा कहीं ऐसा तो नही कि कोई दरवाज़ा बजाता हो और फिर मैजिक ऑय के सामने से हट जाता हो...लेकिन खिड़की से झाँकने पर भी कोई न दिखा और आवाज़ बदस्तूर जारी रही...

मैंने पुलिस में कॉल करने की सलाह दी ही थी कि इतने में पापा की नज़र खिड़की से झांकते हुए दरवाज़े की चौखट पर पड़ गयी, देखा तो वहां हमारी रोज़ी खड़ी हुई थी और अपने अगले पैरों से लगातार दरवाज़े को हिला रही थी...रोज़ी हमारी हट्टी कट्टी पर्शियन बिल्ली थी जो उस रात ना जाने कैसे घर के बाहर निकल गयी थी और इधर उधर आवारगी करने के बाद वापस अंदर घुसने का रास्ता तलाश कर रही थी ,क्रिकेट के चक्कर में हमें रोज़ी का ख्याल भी न रहा जो अक्सर घर के बाहर निकल इधर उधर घुमक्कडी कर लिया करती थी

दरवाज़ा चूँकि लोहे का था इसलिए उसका नाज़ुक सा धक्का भी तेज़ आवाज़ पैदा करने के लिए पर्याप्त था, पापा ने दरवाज़ा खोला, रोज़ी दौड़कर अंदर आई और सोफे पर अपनी निर्धारित जगह कूद कर लेट गयी...पापा और मैं वापस अंदर आये और फिर जब थोड़ी देर में हमारी आँखे मिली तो अपनी अपनी जगह बैठ हम काफी देर तक हसते रहे.....

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

मिस्ड कॉल पार्टी

मिस्ड कॉल सदस्यता
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ताज़ी खबर यह है कि बीजेपी दुनिया का सबसे बड़ा राजनैतिक दल बन गयी है, कोई भी देशवासी महज़ एक मिस्ड कॉल के माध्यम से पार्टी का सदस्य बन सकता है और पार्टी की गतिविधियों में शामिल हो सकता है,पार्टी का दावा है कि लगभग 8 से 9 करोड़ लोगों ने पार्टी की सदस्यता मिस्ड कॉल के माध्यम से हासिल की,

उधर कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि उनके मोबाइल पर पहले एक नंबर से मिस्ड कॉल आई,जब प्रवक्ता जी ने पलट कर जानना चाहा कि किसकी कॉल है तो उधर से कंप्यूटर महोदय ने एक सुरीली सी महिला की आवाज़ बनाकर नेताजी को बीजेपी सदस्यता की मुबारकबाद दी, एक तो महिला की आवाज़ वो भी सुरीली,वो कांग्रेसी ही क्या जो फिसल न जाये, एक कांग्रेसी भाजपा से या किसी भी विरोधी से चाहे जितनी चिढ क्यों न रखता हो लेकिन सुरीली आवाज़ों पर वो चित्त हो ही जाता है,मेरा ऐसा विचार है कि प्रवक्ता जी उस समय तो मंत्रमुग्ध होकर सुरीली आवाज़ सुनते रहे होंगे लेकिन बाद में छले जाने का अहसास होने पर उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस बुला डाली...

कांग्रेस से याद आया, राजनैतिक दलों की सदस्यता की भी बड़ी अजीब  अजीब प्रक्रियाएं हुआ करती हैं... एक बार लखनऊ के मेरे एक निकट मित्र जो उम्र में मुझसे काफी बड़े और शहर कांग्रेस के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष भी थे,को पार्टी की ओर से वार्षिक सदस्य बनाने का टारगेट मिला,
उन्हें तक़रीबन दो सौ के लगभग सदस्य बंनाने थे, पूरा कुनबा,आस पड़ोस और सहकर्मी मिलकर भी उनसे हो नही पा रहा था,एक शाम वो मेरे पास भी फॉर्म लेकर आ धमके,
मैंने ज़रा चौंकते हुए उनसे कहा "लेकिन मैं तो साम्यवादी विचारधारा रखता हूँ इसे आप मेरे पास क्यों लाये हैं", जवाब जो मिला वो सन्न कर देने वाला था,नेताजी बोले-'आप समझे नही रिज़वी साहब,आप चाहे जिस विचारधारा से हों,बस मेरा टारगेट पूरा करवा दीजिए उसके बाद सदस्यता पर्ची चाहे आप फाड़ कर भी फेंक देंगे मुझे कोई फर्क नही पड़ता'
मैंने हैरान परेशान देखकर उनकी बात मान ली और चाय पिलाकर किसी तरह उन्हें विदा किया,

अक्सर कॉलेजों विश्वविधालयों के बाहर कैम्प लगाये राजनैतिक दलों के कार्यकर्त्ता दिख जाते, हर आने जाने वाले छात्र छात्रा को आग्रहपुर्वक बुलाकर उनकी "पर्ची काट" कर दी जाती रहती,
इन कैम्पों में सत्ताधारी दल के शिविर के आसपास सबसे ज़्यादा भीड़ रहती है,
उत्तर प्रदेश में तो विशेषकर समाजवादी पार्टी के सदस्यता कैंपो में अच्छी खासी भीड़ हो जाती, लड़के पहले सदस्यता रसीद कटाते हैं और उसके बाद चौड़े होकर कहते "अब चलेंगे खुलकर बिना हेलमेट,देखते हैं कौन स्साला पुलिसवाला...."

हाँ इस मामले में बहनजी का कैडर बड़ा स्ट्रांग रहता है, बहनजी सदस्यता अभियानों पर कोई ख़ास ज़ोर भी नही देतीं, उन्हें मालूम है की उनका वोटर फिक्स है, कार्यकर्त्ता पूरे चुनाव घर से बाहर भी न निकले, प्रत्याशी की जगह बहनजी एक गुम्मा ही क्यों न खड़ा कर दें,  "समाज" का वोट तो बहनजी को ही पड़ना ही है,उसे कोई नही हिला सकता,

इक्का दुक्का "संसदीय कमनिस्टिए" भी भगत सिंह का पोस्टर मय लाल लाल झोला के बगल में टांगे और लंबे लंबे क्लिष्ट भाषा वाले पर्चे हाथों में लिए दिख जाते हैं....

एक बार ऐसे ही कुछ "कामरेड" एक कॉलेज के बाहर अपनी पार्टी के बारे में जानकारी देने के उद्देश्य से शिविर लगाये बैठे थे, एक दो छात्र भगत सिंह का पोस्टर देख उत्सुकतावश उनके पास गए, उनसे सदस्यता के बारे में पूछने लगे,

एक वरिष्ठ कामरेड ने उन्हें एक लम्बा सा खर्रा टिकाना शुरू कर दिया जिसमे वर्तमान राजनैतिक दलों के वर्गचरित्र और दुनिया पर आसन्न आर्थिक संकट का सविस्तार तकनीकी वर्णन था.....

पर्चे पर यह भी लिखा था की "भारत में मार्क्सवादी दृष्टिकोण की एकमात्र सही लाइन केवल उनकी पार्टी के पास ही है और उनकी कोई अन्य शाखा नहीं है...संशोधनवादियों से होशियार"

एक छात्र पर्चा लेकर उसको पढ़ने लगा,अभी 2-4 लाइन ही पढ़ी होगी उसने और मुस्कुराते हुए पर्चा वापस लौटा दिया, उसने उन से उसमे लिखा लेख मर्म सहित समझाने को कहा, एक कामरेड ने समझाना शुरू किया लेकिन उनकी भाषा और पर्चे की भाषा में कोई ख़ास अंतर नज़र न आते देख छात्र आगे बढ़ गए, बाकियों ने भी सर खुजाना शुरू कर दिया,

भाषा पर्चे की इतनी क्लिष्ट थी की छात्रों ने अपने पूरे जीवन में इतने खतरनाक शब्द ना पढ़े होंगे, एक छात्र जो ज़रा जल्दी में था और पर्चा लेकर कॉलेज में दाखिल हो गया, उसको पर्चा बड़ा सुंदर लग रहा था, उसपर भगत सिंह की तस्वीर बनी थी,उसके पड़ोस में रहने वाले आरएसएस के एक अंकल उसे अक्सर समझाया करते "सरदार भगत सिंह" एक सच्चे "राष्ट्रवादी" और "माँ भारती के सच्चे लाल थे" भगत सिंह का व्यक्तित्व उसे बड़ा आकर्षित करता,

बस उनके विचार उसे नही मालूम थे उसने सोचा वो उन्ही अंकल से भगत सिंह के विषय में भी पूछ लेगा...
पर्चे पर हंसिए हथौड़े का चिन्ह भी मौजदू था,बस भाषा इतनी तकनीकी किस्म की थी कि उसका तात्पर्य उसके पल्ले नही पड़ रहा था,
छात्र ने अपने एक गुरु की सहायता से उनको समझना चाहा, गुरूजी पर्चा देखकर बोले -"अभी मुझे स्टाफ हॉल में एक बैठक में शामिल होने जाना है,बाद में समझाता हूँ"

छात्र को समझते देर न लगी की गुरूजी की चिकनी टंट से ये शब्द उसी तरह फिसल चुके हैं जैसे उसके सर से स्टैट्स की क्लास का लेक्चर निकलता है...अक्सर कक्षा में भी किसी छात्र के कोई तकनीकी विषय को एकर प्रश्न पूछ लेने पर गुरूजी इसी तरह विचलित हो जाया करते थे और कभी छात्रों को विषय ने ना भटकने और कभी विषय से सम्बंधित होने पर "कल बताऊंगा" कहकर टाल दिया करते थे..
छात्र अब तक चिढ गया था,उसने पर्चा फेंका और आगे बढ़ गया..
थोड़ा आगे जाने पर एक दिवार के खम्भे के ऊपर उसकी नज़र पड़ी, वहां पीएम की खूबसूरत तस्वीर के साथ एक सुन्दर सा पोस्टर लगा था,पोस्टर पर लिखा था, "बीजेपी के सदस्य बनें,सिर्फ एक मिस्ड कॉल दें और जुड़ें सीधे मोदी के साथ"

छात्र ने जेब से मोबाइल निकाला और नंबर डायल करना शुरू कर दिया....

~इमरान~