रविवार, 26 अप्रैल 2015

मेरी काल्पनिक प्रेयसि

मेरी काल्पनिक प्रेयसि
सुबह जगाती है मुझे
अपनी आवाज़ के
नर्म साज़ों से
मुझे बहलाती हुई
अपने इक़रार के
पुरअम्न नाज़ों से
टूट कर चाहते हुए
मुझको दिलासे देती
जी भर वो प्यार के
शिकवे भी सुनाती है
फिर नशीली शब् को
सिमटती हुई सी
समा जाती है
मेरे सीने में कहीं
खो सी जाती है
और फिर बज़रिये
आँखों के रास्ते से
दिल में उतर जाती है
कहीं खो सी जाती है
मेरी काल्पनिक प्रेयसि फिर
सुबह जगाती है मुझे...

~इमरान~

आखिर उल्लू कौन ?

पता नही उल्लू का नाम उल्लू किसने रखा होगा,रखा भी तो यह नाम आगे चलकर मूर्खता का प्रतीक कैसे बन गया...लेकिन मुझे तो यह एक बेहद शानदार और खूबसूरत परिंदा लगता है । मेरे घर में अक्सर मुंडेरों पर छत पर या बगीचे में कभी कभी दिख जाया करता है... इसका अन्य परिंदों की तुलना में बड़ा और भारी शरीर, तीखी नुकीली चोंच,रहस्यमयी आँखें मुझे बहुत आकर्षित करती हैं ।

अगर अपने कभी इस जानवर को नज़दीक से देखा हो तो आप खुद इसकी सुंदरता की तारीफ किये बिना नही रह सकेंगे । क़ुदरत के इस नायाब नमूने को उड़ते हुए देखना तो अलग ही अनुभव होता है...यह बिलकुल धीमे और एक शाही से अंदाज़ में उड़ता है और उस वक़्त यह बेहद कम बार ही पंख फड़फड़ाता है ।

लेकिन बदकिस्मती ! अन्धविश्वास के धनी हमारे देश में इस सुंदर जीव को "मनहूस" समझा जाता है और इसकी घर में या आसपास मौजूदगी को कई जगह अशुभ माना जाता है जिसके चलते लोग अक्सर इसे मार भी देते हैं या इसका आशियाना उजाड़ देते हैं ।

विदेशों में तो कई जगह लोग इसे बाक़ायदा अपने घरों में पालते हैं और प्रशिक्षित भी किया जाता है । ठीक उसी तरह जैसे भारत में लोग शिकरे (यानि बाज़) को पालते और प्रशिक्षित करते हैं, लेकिन जैसा की मैंने देखा उसे पालने और ट्रेन करने की जो विधि है वो बड़ी क्रूर और पीड़ादायक होती है।

पहले तो इस पक्षी को पकड़ कर किसी पिंजरे में बन्द कर दिया जाता है और फिर कोई नशीली दवा खिलाकर इसे मूर्छित कर देते हैं,उसके बाद जो होता है उसे पढ़कर आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे ,इसकी दोनों आँखों को पलको से आपस में मिलाकर सुई से बाक़ायदा सिलाई कर दी जाती है, तत्पश्चात पंद्रह बीस दिनों तक हाथ पे एक मोटे चमड़े का दास्ताना पहनकर इसे बांह पर बैठने का अभ्यास कराया जाता है, इस दौरान इसे नशे का हल्का डोज़ लगातार देते रहते हैं जिससे इसकी आक्रामकता कम हो जाये और यह पालतू बन जाये । फिर कुछ वक़्त बाद पलकों की सिलाई भी खोल दी जाती है ।

विलुप्त होता देख इसके संरक्षण के लिए राज्य द्वारा कानून ज़रूर बनाये गए लेकिन कहीं कहीं चोरी छिपे यह क्रूर हरकतें अभी भी देखने को मिल जाती हैं । लखनऊ में मैंने खुद अपनी आँखों से कई बार शिकरे और उल्लू को प्रशिक्षित करते हुए देखा है ।
तब मैं सोचता था बाज़ को यह कितना सालता होगा कि उल्लू कितना खुशनसीब है उसे कुछ जगहों पर मनहूस या अशुभ  मानकर लोग छूते नही,
लेकिन शौक़ीन मिजाजों ने अपने शौक़ की पूर्ती के लिए जिस तरह बेदर्दी से इन शानदार और खूबसूरत जानवरों को जो ताबड़तोड़ नुकसान पहुंचाए हैं उसका नतीजा यह है कि आज शिकरा तो विलुप्ति की कगार पर पहुँच गया है और दिखाई ही नही पड़ता,
मुझे याद है की आखिरी बार मैंने बाज़ तब देखा था जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था,तब से आजतक यह चिड़िया कहीं स्वछंद विचरण करती नज़र नही आई....आपको याद हो तो बताएं...
हालाँकि ज़्यादा बड़ी वजह इनके विलुप्तिकरण की पर्यावरण से जुडी है (उसके मूल में भी इंसानी करामात हैं), लेकिन इनकी विलुप्ति के सहायक कारणों में से इन्हें पालतू बनाने और इनके शिकार का इंसानी पागलपन भी है ।
अक्सर सोचता हूँ कि अगर जानवरों में भी शुभ अशुभ जैसी कोई मान्यता होती होगी तो निःसंदेह उनके अनुसार इस दुनिया का सबसे मनहूस जानवर इंसान ही ठहरता होगा ।

उसे समझा हमने

उसने कहा था यहीं रुके रहना
तबसे पहलू भी न बदला हमने

जिसने समझा था कोई खेल हमें
क़ाबिल ए इश्क़ उसे न समझा हमने

वफाओं की हुई कभी जो सख्त कमी
दामन अपना कभी न समेटा हमने

उसको रुसवाई से था सख्त परहेज़
नाम उसका कहीं न लिक्खा हमने

खत जो भेजा था साथ तोहफे के
उस खत को भी न सहेजा हमने

दामन ए वक़्त से जो निकला था
एक किस्सा जिसे लिखा हमने

नज़्म आई मेरा तवाफ़ किया
आँख भर कर उसे था देखा हमने

~इमरान~

धुआं देता था आग का पता

धुआं देता था आग का ही पता
रास्ता लेकिन पानी को न मिला

रास्ते खूब किये तय हमने मगर
कोई मन्ज़िल या हमसफ़र न मिला

शोर होता रहा शब् भर मेरे गिर्द
बात क्या थी ये कुछ पता न चला

फ़िक्रें घेरे रहीं यूँ माज़ी की
मुस्तक़बिल को ही मेरा घर न मिला

टेढ़े रस्तों पे खूब भटका किया
कोई सीधा सा रहगुज़र न मिला

ज़िन्दगी यूँ रोकती रही मुझ को
मौत को खेंचने का गुर न मिला

उनकी आमद के निशां हैं तो यहां पर मौजूद
वो यहां आया था पर उसे मैं न मिला

~इमरान~

कालेज से वापस

कॉलेज से वापस
घर आती हुई लड़की
कई आँखों के धेलों में
उतरने सी लगी
उसके बदन की
हर एक हरकत
कई दिलों पा
देती रही दस्तक
नज़रें ज़मीं में गड़ाये
वो तो चलती रही लेकिन
कई चलती हुई निगाहें
रुक सी गयीं
उसके गिर्द हर सूँ
मानो देख रही थीं
उसकी चाल की गति
उसके नितम्बों से लेकर
सीने के उभारों तक
उसके शरीर का
माप ले रही थीं जैसे
यक ब यक उस लड़की को
कई तीर से हुए महसूस
उसका जिस्म छेदते
नुकीले नयन बाण जैसे
तेज़ी से फिर
उसने संभाला अपना
गिरता हुआ दुपट्टा
किस तरह पाठशाला से
घर का रस्ता
तय कर ही डाला
आज फिर उसने
मैदान जीत ही लिया

~इमरान~

सियासी मौसम

तेज़ आवाज़ों से
गरजता हुआ आसमां,
गिरा रहा है
धरती पर,
महज़
चन्द बूंदे बरा ए नाम,
मिजाज़ मौसम का
आज हद दर्जा सियासी है...

~इमरान~

गुलामी की ज़ंजीरें

इक तय ढर्रे पर
चली आ रही है
दस से पांच की
वो उजरती गुलामी
जकड़ी हुई सरमायेदारों के
वहशी पंजो में
छटपटाती सी ज़िन्दगी
उसे समझ बैठी है
अपने जीवन की नियति
इसे ये भी नहीं मालूम
इसके लिए तो
सारा जहान रक्खा है
क़ुदरतों का निज़ाम रक्खा है
लेकिन निज़ाम ने इसे
महदूद कर दिया
किसी उजरती गुलामी में
इसे बताना होगा
कि ये दुनिया
उनकी नही हमारी है
इसमें हम सबकी हिस्सेदारी है
यही चिंगारी सुलगा कर
दिलों में उनके
लाल मशाल जलानी है
हम बहुत जी लिए गुलामी में
अब तो दुनिया नई बनानी है ....

~इमरान~

अच्छी तस्वीर अब नही आती

अच्छी तस्वीर अब नही आती
मेरी सूरत संवर नही पाती

बाल कितने भी मैं सही कर लूँ,
ज़ुल्फ़ें रूकती नहीं हैं बिखर जाती

मेरे कपड़े भी सब सिकुड़ से गए
इनसे सिलवट भी अब नही जाती

पाँव में जूतियां तो आती हैं
उमंग क़दमों में पर नही आती

इत्र चाहे लगा लूँ मैं जितने
खुशबू मुझसे तेरी नही जाती

मेरा मफलर गले में रहता है
इससे सर्दी लेकिन नही जाती

घेरे रहती हैं मुझको यूँ फ़िक्रें
शिकन पेशानी से अब नही जाती

करता रहता है दर्द मेरा तवाफ़
याद माज़ी की मिट नही पाती

हंसी तो हो गयी थी तभी गायब
अब तो मुस्कान भी नही आती

~इमरान~

अवसाद की पैराहन

रातें होती हैं
कई नींद से खाली
कभी सांसो में
होता है नदारद कोई,
मतलब इसका लेकिन
हरगिज़ ये नही होता,
की न आएगी
सुबह उजली नई
अपने हस्बे मामूर
तुम बस,
मेरा इक काम करो
दफन करके
तल्ख यादों को माज़ी की,
वक़्त ए सुबह की
तज़ादमी के खुद में
उतार लिया करो लम्हात
माना होते हैं उनमे
कई शिकवे ओ गिले
कुछ गलतियां भी,
चीनी मिटटी के कप में
किसी गर्म चाय की मानिंद
उलट कर उसको
पिला दिया करो मुझको
वो तल्खियाँ सारी,
अपनी वो सारे
दर्द और तकलीफ,
अपने अवसाद की पैराहन,
लपेट कर मुझमे,
मुझसे खूब तुम
किया करो शिकवे,
मैंने किया है न
सच्चा वादा तुमसे,
कोई तकलीफ कभी तुमको,
न दूंगा सहने कभी तन्हा जाना....

~इमरान~