शनिवार, 4 अप्रैल 2015

तामीर वाले हाथ

ये दुनिया
नज़्म है एक
या कोई ग़ज़ल
या फिर सुरीला गीत
नही जनाब,
यह दरअसल 
चंद मज़लूम हाथों की
बनाई इक तस्वीर है
तस्वीर जिसमें
बनाने वालों ने
बजाये रंग के
मिलाया है अपना लहू
और फिर अपनी हड्डियों के 

फ्रेम वाले कनवास पर

सजाकर मानिंद ए वरक़
इसे किस जतन से बनाया है
इन तामीर करने वाले हाथों ने
इसे क्या खूब सजाया है

~इमरान~

मिस्ड कॉल पार्टी

मिस्ड कॉल सदस्यता
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ताज़ी खबर यह है कि बीजेपी दुनिया का सबसे बड़ा राजनैतिक दल बन गयी है, कोई भी देशवासी महज़ एक मिस्ड कॉल के माध्यम से पार्टी का सदस्य बन सकता है और पार्टी की गतिविधियों में शामिल हो सकता है,पार्टी का दावा है कि लगभग 8 से 9 करोड़ लोगों ने पार्टी की सदस्यता मिस्ड कॉल के माध्यम से हासिल की,

उधर कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि उनके मोबाइल पर पहले एक नंबर से मिस्ड कॉल आई,जब प्रवक्ता जी ने पलट कर जानना चाहा कि किसकी कॉल है तो उधर से कंप्यूटर महोदय ने एक सुरीली सी महिला की आवाज़ बनाकर नेताजी को बीजेपी सदस्यता की मुबारकबाद दी, एक तो महिला की आवाज़ वो भी सुरीली,वो कांग्रेसी ही क्या जो फिसल न जाये, एक कांग्रेसी भाजपा से या किसी भी विरोधी से चाहे जितनी चिढ क्यों न रखता हो लेकिन सुरीली आवाज़ों पर वो चित्त हो ही जाता है,मेरा ऐसा विचार है कि प्रवक्ता जी उस समय तो मंत्रमुग्ध होकर सुरीली आवाज़ सुनते रहे होंगे लेकिन बाद में छले जाने का अहसास होने पर उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस बुला डाली...

कांग्रेस से याद आया, राजनैतिक दलों की सदस्यता की भी बड़ी अजीब  अजीब प्रक्रियाएं हुआ करती हैं... एक बार लखनऊ के मेरे एक निकट मित्र जो उम्र में मुझसे काफी बड़े और शहर कांग्रेस के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष भी थे,को पार्टी की ओर से वार्षिक सदस्य बनाने का टारगेट मिला,
उन्हें तक़रीबन दो सौ के लगभग सदस्य बंनाने थे, पूरा कुनबा,आस पड़ोस और सहकर्मी मिलकर भी उनसे हो नही पा रहा था,एक शाम वो मेरे पास भी फॉर्म लेकर आ धमके,
मैंने ज़रा चौंकते हुए उनसे कहा "लेकिन मैं तो साम्यवादी विचारधारा रखता हूँ इसे आप मेरे पास क्यों लाये हैं", जवाब जो मिला वो सन्न कर देने वाला था,नेताजी बोले-'आप समझे नही रिज़वी साहब,आप चाहे जिस विचारधारा से हों,बस मेरा टारगेट पूरा करवा दीजिए उसके बाद सदस्यता पर्ची चाहे आप फाड़ कर भी फेंक देंगे मुझे कोई फर्क नही पड़ता'
मैंने हैरान परेशान देखकर उनकी बात मान ली और चाय पिलाकर किसी तरह उन्हें विदा किया,

अक्सर कॉलेजों विश्वविधालयों के बाहर कैम्प लगाये राजनैतिक दलों के कार्यकर्त्ता दिख जाते, हर आने जाने वाले छात्र छात्रा को आग्रहपुर्वक बुलाकर उनकी "पर्ची काट" कर दी जाती रहती,
इन कैम्पों में सत्ताधारी दल के शिविर के आसपास सबसे ज़्यादा भीड़ रहती है,
उत्तर प्रदेश में तो विशेषकर समाजवादी पार्टी के सदस्यता कैंपो में अच्छी खासी भीड़ हो जाती, लड़के पहले सदस्यता रसीद कटाते हैं और उसके बाद चौड़े होकर कहते "अब चलेंगे खुलकर बिना हेलमेट,देखते हैं कौन स्साला पुलिसवाला...."

हाँ इस मामले में बहनजी का कैडर बड़ा स्ट्रांग रहता है, बहनजी सदस्यता अभियानों पर कोई ख़ास ज़ोर भी नही देतीं, उन्हें मालूम है की उनका वोटर फिक्स है, कार्यकर्त्ता पूरे चुनाव घर से बाहर भी न निकले, प्रत्याशी की जगह बहनजी एक गुम्मा ही क्यों न खड़ा कर दें,  "समाज" का वोट तो बहनजी को ही पड़ना ही है,उसे कोई नही हिला सकता,

इक्का दुक्का "संसदीय कमनिस्टिए" भी भगत सिंह का पोस्टर मय लाल लाल झोला के बगल में टांगे और लंबे लंबे क्लिष्ट भाषा वाले पर्चे हाथों में लिए दिख जाते हैं....

एक बार ऐसे ही कुछ "कामरेड" एक कॉलेज के बाहर अपनी पार्टी के बारे में जानकारी देने के उद्देश्य से शिविर लगाये बैठे थे, एक दो छात्र भगत सिंह का पोस्टर देख उत्सुकतावश उनके पास गए, उनसे सदस्यता के बारे में पूछने लगे,

एक वरिष्ठ कामरेड ने उन्हें एक लम्बा सा खर्रा टिकाना शुरू कर दिया जिसमे वर्तमान राजनैतिक दलों के वर्गचरित्र और दुनिया पर आसन्न आर्थिक संकट का सविस्तार तकनीकी वर्णन था.....

पर्चे पर यह भी लिखा था की "भारत में मार्क्सवादी दृष्टिकोण की एकमात्र सही लाइन केवल उनकी पार्टी के पास ही है और उनकी कोई अन्य शाखा नहीं है...संशोधनवादियों से होशियार"

एक छात्र पर्चा लेकर उसको पढ़ने लगा,अभी 2-4 लाइन ही पढ़ी होगी उसने और मुस्कुराते हुए पर्चा वापस लौटा दिया, उसने उन से उसमे लिखा लेख मर्म सहित समझाने को कहा, एक कामरेड ने समझाना शुरू किया लेकिन उनकी भाषा और पर्चे की भाषा में कोई ख़ास अंतर नज़र न आते देख छात्र आगे बढ़ गए, बाकियों ने भी सर खुजाना शुरू कर दिया,

भाषा पर्चे की इतनी क्लिष्ट थी की छात्रों ने अपने पूरे जीवन में इतने खतरनाक शब्द ना पढ़े होंगे, एक छात्र जो ज़रा जल्दी में था और पर्चा लेकर कॉलेज में दाखिल हो गया, उसको पर्चा बड़ा सुंदर लग रहा था, उसपर भगत सिंह की तस्वीर बनी थी,उसके पड़ोस में रहने वाले आरएसएस के एक अंकल उसे अक्सर समझाया करते "सरदार भगत सिंह" एक सच्चे "राष्ट्रवादी" और "माँ भारती के सच्चे लाल थे" भगत सिंह का व्यक्तित्व उसे बड़ा आकर्षित करता,

बस उनके विचार उसे नही मालूम थे उसने सोचा वो उन्ही अंकल से भगत सिंह के विषय में भी पूछ लेगा...
पर्चे पर हंसिए हथौड़े का चिन्ह भी मौजदू था,बस भाषा इतनी तकनीकी किस्म की थी कि उसका तात्पर्य उसके पल्ले नही पड़ रहा था,
छात्र ने अपने एक गुरु की सहायता से उनको समझना चाहा, गुरूजी पर्चा देखकर बोले -"अभी मुझे स्टाफ हॉल में एक बैठक में शामिल होने जाना है,बाद में समझाता हूँ"

छात्र को समझते देर न लगी की गुरूजी की चिकनी टंट से ये शब्द उसी तरह फिसल चुके हैं जैसे उसके सर से स्टैट्स की क्लास का लेक्चर निकलता है...अक्सर कक्षा में भी किसी छात्र के कोई तकनीकी विषय को एकर प्रश्न पूछ लेने पर गुरूजी इसी तरह विचलित हो जाया करते थे और कभी छात्रों को विषय ने ना भटकने और कभी विषय से सम्बंधित होने पर "कल बताऊंगा" कहकर टाल दिया करते थे..
छात्र अब तक चिढ गया था,उसने पर्चा फेंका और आगे बढ़ गया..
थोड़ा आगे जाने पर एक दिवार के खम्भे के ऊपर उसकी नज़र पड़ी, वहां पीएम की खूबसूरत तस्वीर के साथ एक सुन्दर सा पोस्टर लगा था,पोस्टर पर लिखा था, "बीजेपी के सदस्य बनें,सिर्फ एक मिस्ड कॉल दें और जुड़ें सीधे मोदी के साथ"

छात्र ने जेब से मोबाइल निकाला और नंबर डायल करना शुरू कर दिया....

~इमरान~

मंगलवार, 31 मार्च 2015

पाठ्यक्रम -भारत का इतिहास-कक्षा 8 (सन्2099

पाठ्यक्रम -भारत का इतिहास-कक्षा 8 (सन्2099)

बहुत समय पहले की बात है, इस मुल्क में एक किसान नामक चालाक प्राणी रहा करता थ,ये एक बेहद दुबला पतला सा लेकिन गज़ब का जीवट किस्म का बन्दा हुआ करता था,कोई काम धाम तो इसके पास रहता नहीं था,अतः रात सूरज निकलने के दो घण्टा पहले से अपने अपने खेतों में पहुँच जाया करता था और वहां जाकर पागलों बेवकूफों की तरह हल चलाना और मेढ़ बांधना शुरू कर देता था,

चूँकि किसान को सिंचाई वगैरह के लिए अधिकतर वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता था लिहाज़ा कभी कभी बारिश न होने पर फसल कम हो जाती , अक्सर ऐसा भी होता था की बिन मौसम की बरसात के कारण खड़ी फसल भी बर्बाद होने लगती...

इस सबके चलते इसने एक बेहद बुरी आदत पैदा कर थी...बात बात पर ये सरकार बहादुर से क़र्ज़ लिया करता था, सरकार चूँकि बड़ी दयालु,भोली भाली और जनहित के सरोकारों वाली संस्था होती है, वो किसान को बिन ब्याज का क़र्ज़ दे दिया करती थी,

लेकिन चालाक किसान सरकार बहादुर की इस दरियादिली का गलत फायदा उठाता था, वो क़र्ज़ ले तो लेता लेकिन सरकार को वापस नहीं करता था, वापस न करने के हज़ार बहाने तलाश लेता था लेकिन कर्ज़ा लौटाता न था,
कभी वो कहता कि बारिश ना होने के कारण फसल नहीं हुई, तो कभी वो कहने लगता कि असमय बारिश हो जाने से फसल खराब हो गयी....

यानि देखी आपने इसकी चालाकी? बारिश हो तो भी बहाना, ना हो तो भी बहना, खैर सरकार किसान की इन चालबाजियों को बड़ी अच्छी तरह पहचानने लगी थी,

सरकार पहले तो बड़े प्यार से उसके घर बैंक के एजेंट भेजती, फिर नोटिस वगैरह, लेकिन बेगैरत किसान इतना चालाक होता था कि इन सबसे बचने के लिए वो घर से ही गायब हो जाया करता था,
लेकिन आखिरकार जब नौबत आ ही जाती और किसान को ये अहसास हो जाता की अब वो सरकार के चंगुल से बच नही सकेगा तो फिर उसने ऋण चुकाने से बचने का एक और नायाब नुस्खा निकाला, वो नुस्खा था "आत्महत्या" का,

जैसा की आप जानते हैं भारत एक धर्मप्रधान देश हैं,हमारे यहां धर्मग्रंथों में लिखा है की ये शरीर नश्वर है, जिस्म फानी है, मरने के बाद आप अगर हिन्दू हैं तो पुनर्जन्म/स्वर्ग और मुस्लमान हैं तो आखिरकार जन्नत आपको मिलनी ही मिलनी है, लिहाज़ा चालाक किसान अपनी नई योजना के तहत जन्नत और स्वर्ग की लालच में सरकार बहादुर का पैसा हड़प करके बिना चुकाए ही जन्नत के मज़े लूटने आसमान की जानिब चला जाता था....

इसी तरह ये लालची प्रजाति धीरे धीरे सरकार का सारा पैसा क़र्ज़ की शक्ल में लेकर उसे अय्याशियों में उड़ाती और जब चुकाने की बारी आती तो धरती छोड़कर स्वर्ग भाग जाती थी...चूँकि स्वर्ग का एरिया सरकार बहादुर के नियंत्रण से बाहर है अतएव वो इस पलायन पर कुछ न कर सकी....

फिर सरकार ने अपने सलाहकारों की एक बैठक बुलाई, बैठक में उपस्थित "भद्रजनों" ने किसानों की इस धूर्तता से सरकार बहादुर को बचाने का एक नया तरीक़ा ईजाद कर निकाला,
अब सरकार ने किसानों की ज़मीनें अधिग्रहित करना शुरू कर दीं और उसपर बड़े बड़े उधोग लगाने शुर कर दिए, पहले किसान इन ज़मीनों पर अनाज उगाता था,नतीजा ये निकला की किसान तो सब खुदकुशी करके स्वर्ग/जन्नत भाग गए और अब उन के बच्चे सब अपनी ही ज़मीनों पर बनी इन फैक्ट्रियों में मज़दूरी करने लगे... सरकार के इस क़दम की देश के "बुद्धिजीवी" वर्ग ने भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए उसे खूब सराहा...

इस प्रकार धीरे धीरे कुछ रोज़गार बदलने और कुछ स्वर्ग पलायन के चलते एक दिन ऐसा आया कि धरती से यह किसान नामक चालाक और धूर्त नस्ल आखिरकार विलुप्त ही हो गयी...और इनके जाने से "सभ्य समाज" ने चैन की सांस ली ।

क्या इसीलिए अब हमको पेड़ पौधों के पत्ते और मांस खाकर गुज़ारा करना पड़ता है गुरूजी?

फैक्ट्री में काम करने वाले एक मज़दूर बच्चे ने सवाल किया ही था कि तभी घण्टा बज गया....कक्षा का समय समाप्त हो चुका था, गुरुजी ने एक बार उस बच्चे को जो दरअसल किसान प्रजाति का बचा हुआ अवशेष् लग था था, गुस्से की निग़ाहों से देखा...सहपाठी ने बेंच के नीचे से उसकी जंघा पर हाथ मारा, बच्चा सहम कर चुप हो गया, गुरूजी रजिस्टर लपेट क्लास के बाहर निकल गए थे ।

~इमरान~

आतंकवादियो पर लाख लानतें और वशिकुर रहमान को सलाम !!

ग्रेजुएशन के ज़माने में एक बार मैं अपने कुछ मित्रों के साथ एक मानसिक अस्पताल गया था, वहां हमें अपने एक मित्र के भाई को देखने जाना था जो उस चिकित्सालय में कई दिन से भर्ती थे,

दरअसल भाईसाहब को गांजा पीने की बुरी लत लग गयी थी,उसके अलावा भी कुछ छोटे मोटे नशे वो करने लगे थे,उनकी ये आदत इतना ज़्यादा बढ़ी की एक दिन नशे ने उनका दिमाग ले लिया और बेचारे पागल हो गए,

अब उन्हें एक कमरे में अलग रखा जाता था, जो डॉक्टर उनका इलाज करने जाते वो उन्ही से हाथापाई करने की कोशिशें करते, बड़ी मुश्किल से उन्हें हाथ पाँव से पकड़ कर जांच की जाती और दवा वगैरह दी जाती थी,

भाईसाहब अपनी खराब मानसिक स्थिति और नशे के दुष्प्रभावों के चलते यह समझ सकने में असमर्थ हो गए थे कि आने वाले डॉक्टर्स उनके भले और सेहत के लिए ही उन्हें दवा इत्यादि दे रहे हैं,

बांग्लादेश में अभी दोबारा एक नास्तिक ब्लॉगर की हत्या इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा कर दी गयी....खबर सुनते ही मेरे ज़ेहन में भाईसाहब वाला किस्सा गूंज गया, ये मज़हबी लोग भी दरअसल धर्म के लगातार नशे के कारण सही और गलत में तमीज़ करने की अपनी सलाहियत खो बैठे हैं,

हालत यह है कि अगर कोई तार्किक / वैज्ञानिक सोच रखने वाला सामान्य इंसान इनके बीच इन्हें समझाने बुझाने (इनका इलाज करने) जाता है तो ये उसके साथ भी वही व्यवहार करने लगते हैं जैसे एक मानसिक रोगी अपनी चिकित्सा के लिए आने वाले डॉक्टरों के साथ करता है,

एक मानसिक रोगी (पागल नहीं) और एक कट्टरपंथी धार्मिक ( यानि पक्का पागल) में एक फर्क बस इतना होता है कि मानसिक रोगी यह सब कुछ् बदहवासी और बेहोशी के आलम में करता है और मज़हबी लोग यही काम पूरे होशोहवास में बाक़ायदा योजना बनाकर अंजाम देते हैं....

कानून भी इनका जल्दी कुछ नही बिगाड़ पाता क्योंकी इंसाफ देने वाले सिस्टम में भी इनके जैसे कुछ पागल बैठे ही रहते हैं....

ना जाने धरती को इन पागलों से मुक्ति कब मिलेगी और ना जाने कब दुनिया एक धर्म/मज़हब विहीन महज़ स्वस्थचित्त इंसानों के रहने लायक बन सकेगी,

बहरहाल, किसी विकृतचित्त मानसिकता वाले की हरकतों के चलते जिस तरह एक डॉक्टर इलाज करना नहीं छोड़ देता उसी तरह चंद मज़हबी पागलों की हरकतो के चलते इंसानियत का परचम बुलंद करने वाले अविजित,पनसरे,दाभोलकर,और हालिया ताज़ा शिकार वशिकुर रहमान भी आने वाली नस्लों को इनके मज़हबी नशे की लत से दूर रहने और तार्किक मानवतावादी इंसान बनने का पैगाम देते रहने के अपने फरीज़े से पीछे नही हट सकते,

ये इनकी हत्याएं करते रहेंगे और इसी प्रकार अपनी मूर्खताओं से इनके पैगाम को और भी ज़्यादा ताक़तवर और मशहूर बनाते रहेंगे ।

आतंकवादियो पर लाख लानतें और वशिकुर रहमान को लाल सलाम !!

~इमरान~

रविवार, 29 मार्च 2015

बेमौसम बरसात

मौसम एक बार फिर पलटी सी ले रहा है, तेज़ हवा चल रही है और आंधी जैसे आसार नज़र आ रहे हैं....

कुछ लोग इसमें आशिक़ाना रुमानियत तलाश करेंगे कुछ अपने बिछड़े इश्क़ को याद कर रहे होंगे...किसी के लिए यह उसकी तैयार खड़ी गेंहू की फसल की बर्बादी का पैगाम होगा तो कहीं बालमन धागों में पन्नियाँ बांधे उसे लेकर मैदानों में दौड़ लगा रहा होगा..

प्रकृति का एक ही रंग अलग अलग ज़िन्दगियों के कनवास पर अलग अलग मंज़र उकेरता हैं...
तेज़ हाड़ कंपाती सर्दी अपने आलिशान हवेलियों में आरामकुर्सी पर बैठे अंगीठी के आगे हाथ में रम का पेग और मोटी सी किताब लिए शख्स के लिए कुछ और ही मज़ेदार मआनी रखती है तो वहीं किसी फूटपाथ पर अपने रिक्शे को ही बिछौना बनाये उसी जैसे हड्डी गोश्त वाले इंसान के लिए इसका अलग ही मतलब होता है...

चिलचिलाती गर्मी में लू के थपेड़े सह कर खौलते तारकोल से सड़क बना रहा मज़दूर गर्मी की अलग ही परिभाषा बताता है वहीं अपने तीस बाई चालीस के फुल ऐसी कमरे में लेते डॉक्टर साहब के लिए यह आराम से सोने का वक़्त होता है.....

अभी कुछ दिन पहले भी इसी तरह अचानक तेज़ बारिश शरू हो गयी थी जिसके चलते किसानों को भारी मात्रा में फसल का नुकसान सहना पड़ा था, हालाँकि प्रदेश सरकार ने मुआवज़े और राहत की घोषणा तो ज़रूर की थी लेकिन यह घोषणाऐं ज़मीनी स्तर पर कितनी कारगर साबित होती हैं किसी से छिपा नही है,

बचपन से ही जब कभी अचानक बेमौसम की तेज़ बारिश या आंधी तूफ़ान जैसा मंज़र सामने आता था तो हम बड़े खुश हो जाया करते,फुटबॉल लेकर घर से बाहर निकल मैदान में पहुँच जाना और मौसम के मज़े लूटना बेहद ख़ास शौक़ था...

खैर बचपन के साथ खेल तो छूट ही गए साथ ही छूट गया ये मौसमों के साथ ख़ुशी और गम का रिश्ता भी...

अब तो जहाँ एक तरफ बेमौसम की बरसात ख़ुशी का अहसास दिलाती है तो फ़ौरन ही दूसरी तरफ फौरन किसी किसान को होने वाले भावी नुक्सान और उसके दर्द का अहसास भी करा जाती है...
बारिश में भीगते ये परिंदे मुझे बेघर मज़दूर के भीगते ठिठुरते बच्चों जैसे लगते हैं, इनका कलरव किसी महबूबा का सुरीला गीत ना लगकर किसी बीमार का रुदन प्रतीत होता है....

लिहाज़ा मुझसे कभी इन बेसौमम की बरसातों को लेकर कुछ "रूमानी या अच्छा" नही लिखा जाता...

इन बरसात की बूंदों में महबूब के आंसू तलाशने वालों ने शायद अभी तक क़र्ज़ में डूबे और खुदकुशी की फ़ासी के फदे से लटके किसान की आँखों की खून की बूंदे नहीं देखीं होंगी ऐसा मेरा ख्याल है....और अगर सबकुछ जानने के बाद भी आप ऐसे माहौल में रोमांस तलाश पा रहे है तो माफ़ कीजिएगा साथी...मुझे आपके इंसान होने पर संदेह है...

अपने बच्चों की तरह किसान फसल को पालता है और अचानक से निष्ठुर प्रकृति उसकी आँखों के सामने उसे बर्बाद कर डालती है... अगर वाक़ई कहीं ईश्वर जैसा लेशमात्र भी कुछ है तो बेहद क्रूर है वो...मुझे बड़ा डर लगने लगा है उसके किसी भी प्रकार के अस्तित्व की कल्पना से ही...

सोमवार, 23 मार्च 2015

सफ़र और मंज़िल part II

आसपास मोतिए के फूल महक रहे थे, उसके सामने सुनहरी सेज़ तैयार रखी थी.... सालों से जागती उसकी आँखों में नींद तैरने सी लगी....आँखों के सुर्ख डोरे उभर से गए.... बिस्तर उसकी आँखों के सामने था, उसने खुद को उसपर रख दिया... रखा क्या गिरा दिया था....नरम बिस्तर उसको अनोखा आराम दे रहा था.... ऑंखें अब बंद हो चली थीं.... बन्द आँखों में धीरे धीरे अँधेरा तैरने लगा...जिसे नींद कहते हैं उस नेमत ने उसे यक बा यक सेहराब करना शुरू कर दिया था.... सालों से प्यासे उसके होंठो ने किसी रेगिस्तानी ऊंट की तरह नींद को लबों से पीना शुरू कर दिया...
देखते ही देखते उसकी आँख लग गयी.... सो गया था वो....मगर महज़ उसका वजूद सोया था...उसके अंदर का कोई परिंदा अभी जाग रहा था...अंतर्मन अपने पंख फड़फड़ा रहा था....  उड़ने की तयारी में जैसे कोई जाने को हो,ठीक वैसे ही..... मस्त मन्द सी हवा के झोंके उसे दावत ए परवाज़ दे रहे थे..... वो चल दिया....पंखो को मदमस्त नर्तकी की तरह इठलाता उड़ता दूर गगन के एक नए लोक में प्रवेश कर गया...स्वप्नलोक....एक ऐसी दुनिया जहाँ हक़ीक़त का सामना न कर सकने वाले इंसान कल्पनाओं में जीने का अभ्यास किया करते हैं....जहाँ वास्तविकता से हटकर एक नई ही कायनात बसा करती है.... वहां पहला क़दम रखा उसने.... चारों ओर हसीन सब्ज़े महक रहे थे... एक छोटी सी झील में रंग बिरंगे हंस तैर रहे थे....सामने एक खूबसूरत दरवाज़ा नज़र आया.. उसकी जानिब बढ़ना चाहता था....लेकिन मन में एक झिझक सी थी....उसके पंखों ने एक बारगी उसे रोका सा...लेकिन उसने अनसुनी कर दी.... उस दरवाज़े की खूबसूरती ही ऐसी थी कि वो खुद पर काबू न रख सका... उसके साये ने उसे थामना सा चाहा था...मगर थाम न सका... वो उस दरवाज़े में दाखिल हो ही गया.....बस वही से ख्वाब के मंज़र बदलने से शुरू हो गए... दर के अंदर चारों तरफ सोने और चांदी की नक्काशी थी.... लेकिन वहां से कुछ आगे बढ़ने पर सामने एक जगह पर कोई आग सी भी जल रही थी.... आग के चारों तरफ अजीब किस्म की परेशानियां मौजूद थीं....जिन्होंने उस परिंदे को हर जानिब से घेरना शुरू कर दिया था...कोई तलवार दिखाता था तो कोई भाले की नोंक से डराता था...हसीन ख्वाब अब धीरे धीरे किसी डरावने से मंज़र में तब्दील हो चुका था.... वो उससे बाहर निकलना चाहता था मगर निकल नहीं पा रहा था....कहीं अचानक सामने से अजब अजब शक्लों के दैत्य खड़े हो जाते तो कभी किसी बड़ी सी गुफा से दहाड़ते शेर उसके पीछे लग जाते.... उसने अपनी पूरी ताक़त से उड़ना शुरू कर दिया ..... पीछे आग की लपटें उसके पर जला देना चाहती थीं...उसके पंखों को छू लेने को आतुर उसकी और लपक ही रही थीं कि उसे सामने कहीं दूर एक छोटा सा रौशनदान नज़र आया...अपनी बची खुची क़ूवत समेट कर वो उस रौशनदान की ओर बढ़ चला....तभी अचानक सामने से एक बेहद भयंकर सा शख्स नमूदार हुआ और उसने एक हैंडल घुमाकर रौशनदान को बन्द करना शुरू कर दिया.... वो घबराया और अपने परवाज़ की रफ़्तार को और तेज़ कर दिया .... उस सपनों की दुनिया के भीतर की दुनिया से बस निकला ही चाहता था...रौशनदान से उसका सर बाहर निकला और एकबारगी उसे लगा की उसका आधा शरीर इस बन्द होते दरवाज़े से कट कर भीतर ही रह जायेगा.... बहरहाल वो उस खिड़की से बाहर निकलने में कामयाब हुआ....बाहर निकलकर देखता है की एक अलग ही दुनिया उसके इंतज़ार में सामने खड़ी थी....ये शुरुआत में हसीन लगने वाला ख्वाब पल दर पल भयानक होता जा रहा था.... उसके सामने अब और भी ज़्यादा भयानक मंज़र दरपेश था.... सामने एक आग का दरिया नमूदार हो रहा था.... मौत अपने पंख फैलाये उसके इस्तेकबाल में खड़ी थी.... उसे गले लगा लेना ही चाहती थी कि अचानक पीछे से उसको किसी ने पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया.... उसे अपने परों पर दो हाथ महसूस हुए.... मानो किसी ने उसको ज़ोर से झिंझोड़ा हो..... उसने घबरा कर आँख खोल दी...उसके पंख गायब होकर हाथों में तब्दील हो चुके थे....बाल ओ पर वाले परिंदे से वो दोबारा इक इंसान के पैकर की शक्ल अख्तियार कर चुका था.... ख्वाब हालाँकि टूट गया था लेकिन उसे माथे पर मानो अभी भी उस आग के दरिया की गर्मी की वजह से पसीना मौजूद था..सामने देखा... उसकी हमसफ़र खड़ी थी...... वो मुस्कराया,

"तुम कोई बुरा ख्वाब देख रहे थे...मुझे लगा तुम्हे जगा देना चाहिए...."

"ख्वाब वाक़ई बुरा था,अच्छा किया जो तुमने जगा दिया"

"ख्वाब बुरे ही होते हैं....हमें हक़ीक़त में जीना सीख लेना चाहिए"

मुस्कुरारते हुए साथी ने पूछा...."हम आज कहाँ तक पहुंचे?

"आज हम बाग़ ए हक़ीक़त में जा पहुंचे हैं....यहाँ एक रात क़याम करने और इसकी खुशबुओं को खुद में बसाने के बाद हम अगले पड़ाव पर कूच करेंगे जहाँ फूलों की सेज़ तैयार हमारा इंतज़ार कर रही है"

"तब तक फूल सूख ना जायेंगे?"

"उफ़,तुम कितने सवाल करते हो"

"नही....नही करूंगा....वैसे उस पड़ाव पर कुछ ख़ास है?" उसने शरारत से फिर सवाल दागा....

"कुछ नहीं....बेहद"

अच्छा .....?

इक मुख़्तसर जवाब देकर वो उसका हाथ थामे चलने हो हो दी,जवाब था....

"हाँ.....हमारी इश्क़रात..."

वो मुस्करा कर अपने धड़कते दिल को संभाल उसके पीछे हो लिया......