गुरुवार, 29 जनवरी 2015

वफादार यादें

चीनी मिटटी के कप से,

हलक में उतरती चाय,

कलेजे को जलाती हुई,

ज़ेहन में छोड़ जाती है,

अपने स्वाद की छाप,

सुबह की ताज़ादमी,

नए रोज़ की उमंग,

और फिर हर घूँट के संग,

तैरती जाती हैं ज़ेहन में,

रात की तल्ख़ यादें भी,

यादें जिन्हें बड़ी मुश्किल से,

वक़्त के हवाले कर,

मैं किसी तरह सोया था,

वो फिर घेर लिया करती हैं

फिर सारा दिन वो,

मेरे गिर्द का तवाफ़ करती,

मुझे टीसती रहती हैं,

रात को दोबारा,

फिर से एक बार ,

वक़्त के दामन में,

मेरे हाथो से

गुम हो जाने के लिए,

ताकि सुबह के उजाले के साथ

फिर वापस आ सकें,

ये यादें भी न,

कितनी वफादार होती हैं.....

~इमरान~

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

पहला हक़ मज़दूर का होगा

दिल की गहराईयों में कहीं,
गहरी सी बैठी उदासी,
उदासी को समझाता ज़ेहन,
और ज़ेहन से लड़ता दिल,
एक जीत की कशमकश में,
निरंतर नया सृजन करते हुए,
जन्म देते हैं इंकलाबों को,
कागजों पर नीली स्याही से,
और ज़मीन पर लाल रौशनाई बहाते,
तैयार करते हैं कल की इबारत,
कल जिसकी नींव रखी होगी,
इन्साफ के साफ़ धरातल पर,
जहाँ भट्ठियों में इंसान नहीं,
बस पूँजी झोंकी जाएगी,
कारखानों से निकलते गट्ठरों पर,
पहला हक मजदूर का होगा
और आखिरी हक भी
मजदूर का ही होगा...
~इमरान~

रविवार, 25 जनवरी 2015

वरक़ दर वरक़....

कोई बेहद हसीं सी,
वरक़ दर वरक़,
पढ़ी जाने वाली,
इब्तिदा ए इश्क़ के जैसी,
इंतहा ए उल्फत सी नुमायाँ,
रौशन इबारत सी उजली,
तेरी आँखों से उतर,
मेरे सीने में तैरती,
फिर हमारी साँसों में,
तेरे होंठो के कनारों से,
दरमियाँ हमारे लबों तक,
वरक़ दर वरक़,
कही जाने लगी,
कोई कहानी बेहद हसीं,
अपनी सी लगती,
फिर लिखी जाने लगी....
~इमरान~

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

धर्म और नैतिकता

राजस्थान मेघदूत में प्रकाशित (चित्र संलग्न)

कभी किसी खाली वक़्त में गौर से अपने आस पास के मज़हबी लोगों को देखिएगा....अजब हैरान परेशान से आत्मसंतोष का ढोंग करते ये लोग आपको एक अलग ही दुनिया की अनुभूति देंगे....मौत के बाद किसी संभावित काल्पनिक ज़िन्दगी की आस में अपना जीवन बर्बाद करते हुए ऐसे लोग आपको हर जगह दिख जायेंगे....महज़ धर्म की बिना पर किसी से प्रेम या नफरत करना ऐसे लोगों का प्रधान गुण होता है....
कोई व्यक्ति कितना ही बुरा क्यों न हो , यदि वो इनकी जाती और इनके धर्म का अनुयायी है और वो किसी ऐसे नेक और शरीफ आदमी से भिड़ गया है जो किसी दुसरे धर्म को मानता है तो यह लोग अपने धर्म/मज़हब वाले व्यक्ति की लाख गलती के बावजूद भी उसी अपने सहधर्मी का ही साथ देंगे .....
इस तरह की अंध पक्षपातपूर्ण धार्मिकता सबसे पहले व्यक्ति की न्याय क्षमता और इस प्रकार उसके सही गलत की समझ और सच के साथ खड़े होने की सलाहियत को ख़त्म कर देती है.....और फिर जो इंसान सही के साथ खड़े होने की काबिलियत नही रखता उससे आप क्या उम्मीद कर सकते हैं की वो अपने जीवन में कुछ कर सकेगा?
अच्छा इंसान बन कर समाज के लिए कुछ करने की बात तो छोड़ ही दीजिए,ऐसे लोग खुद अपनी अंतर्मन की आवाज़ को मार के अपने आप को ही धीरे धीरे समाप्त कर देते हैं.....
सही और गलत की पहचान हर इंसान के अंदर स्वाभाविक रूप से होती है...इसके पीछे कोई धर्म नही बल्कि उसकी स्वाभाविक संवेदना होती है जो उसे सही और गलत की समझ प्रदान करती है....कुछ लोगों का कहना है कि इस सही और बुरे के भेद को स्पष्ट करने वाली भावना व्यक्ति में धर्म से आती है....लेकिन ऐसा नही है....अक्सर लोग धार्मिक होते हुए भी अपने धर्म की बहुत सारी बातें नही मानते,या मानते भी हैं तो उसको कभी व्यव्हार में नही लाते....क्योंकि उनका अंतर्मन और उनकी सही को सही और गलत को गलत समझने की स्वाभाविक मानवीय तार्किकता उन्हें ऐसा करने से रोकती है....जैसे इस्लाम में चार शादियों की अनुमति है लेकिन बहुसंख्यक मुस्लिम इसे सही मानते हुए भी व्यवहार में 4 शादियां नहीं करते , ऐसा वो क्यों करते हैं?क्योंकि उन्हें कहीं न कहीं मन में इस बात का अहसास होता है कि ऐसा करना गलत होगा...यह अन्याय होगा अपनी जीवन संगिनी से जो उसके लिए अपना घर परिवार छोड़ उसके प्रेम में खुद को समर्पित किये हुए उसके साथ रह रही है....जो उसके सुख दुःख की साथी रही है....
यह भाव मनुष्य को धर्म नही बल्कि उसका अंतर्मन कहें या उसकी मानसिक तार्किकता कहें,या धर्म से इतर जो भी कह लें ,उसी से मिलता है....अक्सर धार्मिक जन यह दावा करते हैं की नैतिकता का मूल स्त्रोत धर्म है....क्या ऐसा वास्तविकता में है? यदि हम इसकी गहराई में जाएंगे तो पता चलेगा की वास्तविकता में यह सत्य के एकदम नज़्दीक से होकर गुज़रता एक ऐसा मिथ्या विचार है जो सत्य की तरह दिखने के कारण सत्य प्रतीत होता है..वास्तव में नैतिकता तो मनुष्य के अंतर्मन में ही वास करती है....उसका कहीं बाहर से आना संभव ही नही है....इसका कारण और इसके पीछे का तर्क भी वही है जो उपर लिखा जा चूका है.....नैतिकता तो सही को सही और गलत को गलत कहने की सलाहियत का नाम है....वो गलत चाहे धर्म के नाम पर हो रहा हो या किसी वाद के नाम पर....और सही को सही कहना और उसके साथ खड़ा रहना भी नैतिकता है....चाहे वो सही बात करने वाला व्यक्ति आपका कितना ही बड़ा प्रतिद्वंदी क्यों न हो....
एक बात इस विषय में और लिखूंगा....कभी मन से इसको सोचिये और आज़मा कर अवश्य देखिएगा....एक पल को अपने मन से धर्म,जाती,देश मज़हब और वाद की समस्त भावनाओं को अपने मन से एकदम समाप्त करके उनका एकदम से विसर्जन करके फिर अपने आस पास मौजूद इंसानों को देखिएगा....फिर देखिएगा आपके मन में मानवता के लिए कितना प्रेम उमड़ता है....सब लोग आपको आपके अपने लगने लगेंगे....बिलकुल सगे रिश्तेदार जैसे और यह सच भी है की दुनिया के सब इंसानों के बीच आपस में खून का रिश्ता है....
यह तो धर्म/वाद/सीमायें हैं जो उन्हें एक दूसरे में भेद करना और अलगाव पैदा करना सिखाती हैं....यह सब विकार है हमारे पैदा किये हुए  जो इंसान को इंसान से अलग करते हैं....
हो सकता है कोई धर्म अपने समय की व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन रहा हो...लेकिन आज के दौर के लिहाज़ से वो आंदोलन परिमार्जित हो चुके हैं....कोई भी आंदोलन...कोई विद्रोह या कोई सुधार समय के साथ ही कालातीत हो जाता है और एक समय ऐसा आता है कि जब परिस्थितयों के चलते वो आंदोलन या सुधार वर्तमान हालातों में लागू किये जाने के लिहाज़ से सुधार के बजाये बिगाड़ बन जाता है....
हो सकता है कोई विचार किसी समय के लिहाज़ से वरदान रहा हो,लेकिन वक़्त के साथ साथ वो वरदान अभिश्राप भी बन जाता है यह भी सत्य है....क्योंकि सृष्टि सदैव परिवर्तनशील है....
मनुष्य की आवश्यकताएं...समाज में व्याप्त दोषों के आधार पर उसमें सुधार के लिए आवश्यक ज़रूरतें और उन सुधारों के मापदंड सदैव परिवर्तित होते रहते हैं स्थितियों के साथ साथ....जिस काल में जिस समाज में जैसे हालात होंगे उनमें उन्हीं हालातों और स्थितियों के अनुरूप सुधार किया जाएगा....
हज़ार हज़ार साल पुराने फार्मूले हमेशा लागू नही किये जा सकते उनपर....ऐसा करेंगे तो सुधार की बजाये बिगाड़ होना निश्चित ही है....
लेकिन धर्म को तो ज़िद है कि उसे बदलना नही है...धर्म को ज़िद है की बदलना तो समाज को ही है....एक मिसाल देता हूँ.....आप कोई कपडा बनवाते हैं,समय के साथ शरीर का माप बदलने के साथ वो कपड़ा आप हमेशा नही पहन सकते ,उसे बदलना होता ही है, लेकिन कपडा अगर ज़िद थाम ले की आपको तो मुझे ही पहनना है,तो आप क्या करेंगे...ज़ाहिर है उसे फेंक देंगे....
यह मानव स्वभाव है कि जो इसके अनुसार नही चल सकता उसकी वर्तमान परिस्थितियों के लिहाज से यह उसका परित्याग कर देता है....यही हाल धर्म का भी होना है और इसका आरम्भ विज्ञानवाद और तर्कवाद के प्रति बढ़ती जनमानस की रूचि के रूप में हो ही चूका है.....एक न एक दिन मानवता धर्म को भी पुराने कपडे की भांति उतार कर फेंक देगी.....
~इमरान~

रविवार, 28 दिसंबर 2014

गर तुम खुदा थे

राजस्थान मेघदूत में प्रकाशित (चित्र संलग्न)

गर तुम खुदा थे ,

तो रोक लेते पेशावर में अपने बन्दों को,

बहाने से नन्हे बच्चों का खून,

खून जो उनके माँ बाप का था,

उनकी रगों में दौड़ता,

उन्हें फर्श पर बहा के,

क़त्ल कर दिया उनका भी,

साथ बच्चों के माँ बाप ने,

दफन कर दिया दिल अपना भी,

तुम अगर खुदा थे,

तो न लूटने देते किसी दामिनी को,

सर ए बाजार न नीलाम होने देते,

चौरासी के मज़लूमों को,

अगर तुम थे वजूद में मौजूद,

रोकते गुजरात में दरिंदों को,

बड़ी लड़ाइयों में पीसने वाले मासूम

बच जाते मरने से,

लेते ही तेरा नाम,

आ जाता कोई फरिश्ता आसमान से,

और रोक लेता तेरे भक्तों और बन्दों को,

क़त्ल करने से उन मासूमों का,

जिन्होंने तड़पते हुए,

आग में जलने से पहले,

हज़ारों बार रो रो कर,

ज़ार ओ क़तार आंसू बहाये थे,

तुझे पुकारा था,

तुझे बुलाया था,

जो नही रोक तूने,

तू बराबर गुनाह में शामिल,

जो न रोक सका तो फिर,

किस बात का खुदा बनता है?

सच तो यह है,

कि तेरा कोई वजूद नही,

काश कि वो जानते होते,

कि तू तो मर चूका है,

और तेरा जिस्म कहीं

दूर पड़ा किसी सहारा में,

सड़ता हुआ बदबू में सना

पड़ा हुआ है बस,

उसे दफनाने नही देते,

वो कि जिनकी रोटियां,

आती हैं सपने दिखा कर,

तेरे जागने के सपने,

जो कभी पूरे नहीं होंगे,

क्योंकि तू तो कभी,

पैदा ही नही हुआ ,

तुझे तो बस ज़ेहनो में बसाया गया,

लोगों को डराने के लिए,

उन्हें डरा कर के,

भट्टी में खपाने के लिए,

कि वो बस खौफ ए खुदा में,

डरे सहमे से रहकर,

बेचते रहें अपना जिस्म,

पिलाते रहें अपना लहू,

और लहू पर बनते रहें,

महल तेरे क़रीबी बन्दों के,

मीनार तेरे वलियों की मज़ारों के,

बुतक़दे तेरे सनमखानों के,

और उन बुतकदों में पिसती,

कभी कोई अहिल्या,

तो कभी कोई मरियम,

कभी कोई छोटी बच्ची,

और कभी कोई मलाला,

तो कभी पेशावर के नन्हे तलबा,

और चलता रहे कारोबार,

तेरे क़रीबी बन्दों का.....

~इमरान~

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

मंज़िल और सफ़र....

ज़िन्दगी एक न एक बार हर किसी को सफ़र का मौक़ा ज़रूर देती है..उसका भी ये पहला मौक़ा था जब वो घर से बाहर कहीं सफर के लिए निकल रहा था,
ऐसा नहीं था की इसके पहले कभी उसने सफर का कोई तजुर्बा हासिल न किया हो,छोटे मोटे नज़दीकी रास्तों का उसे खूब अनुभव था,लेकिन इस बार बात कुछ अलग थी,इस बार का सफर उसकी ज़िन्दगी में बेहद अहमियत रखता था,क्योंकि जिस मंज़िल के हासिल करने के लिए वो ये सफ़र करने जा रहा था वो उसकी ज़िन्दगी में बहुत ऊँचा मक़ाम रखती थी,या यूँ कह लीजिए वो उसकी ज़िन्दगी का मक़सद थी,
रास्ता बेहद तवील होने के चलते इस सफर पर बिना एक साथी के नही निकला जा सकता था,दरअसल काफी अरसे से इस सफर की ख्वाहिश होने के बावजूद भी वो एक अदद हमसफ़र के न होने के चलते ही इब्तिदा करने से घबरा रहा था,
अब जाने को तो उसके आस पास कई ऐसे लोग थे,जिनमे से किसी को भी वो अपने साथ लेकर जा सकता था,लेकिन वो लोग उसके दिल ओ दिमाग के मुताबिक नही थे,उसकी शख्सियत की कसौटी पर खरे नहीं उतरते थे, हालाँकि,उन लोगों में कोई खराबी रही हो ऐसा कुछ न था,सब एक से बढ़ कर एक हसीन खूबसूरत और खूबसीरत लोग थे,लेकिन जिस खूबी की उसे तलाश थी वो भी नही थी उनके पास,
अक्सर ऐसा होता है कि हमारे पास कई बेहतर से बेहतर लोग मौजूद हों,लेकिन फिर भी ज़ेहन के किसी एक कोने पर हम खुद को तन्हा पाते हैं...इसकी वजह शायद उन लोगों का हमारे मन के उस कोने तक न पहुच सकना होता हो,वो कोना जहाँ हम हकीकत में मिला करते हैं या जहाँ हमारी हक़ीक़त मिला करती है,
ज़ेहन के इस कोने का दरबान बड़ा सख्त होता है, ये हर किसी को अंदर आने भी नहीं देता,जैसे तैसे अगर कोई उस दरवाज़े के आस पास पहुच भी गया तो फिर सख्त तलाशी के दौर शुरू होते हैं, फिर तसल्ली न होने पर उसे वहीँ दरवाज़े से वापस भेज दिया जाता है,
बहुत कम लोग हमारी ज़िन्दगी में इस दरवाज़े को पार कर पाते हैं,और एक बार अंदर आ जाने पर बाआसानी बाहर नहीं निकल पाते,
किस्सा मुख़्तसर यह कि हमारी कहानी के इस किरदार को भी ऐसे ही किसी शख्स की तलाश थी जो उसे मिला भी,एक ऐसा शख्स जो सीधे उसकी निगाहों के रस्ते से मन में उतरा तो फिर उतरता चला गया,दरअसल वो मिल तो काफी पहले गया था लेकिन उसे इस बात का अहसास होने में थोडा सा वक़्त लग गया था,
फिर एक दिन वो वक़्त भी आया जब दोनों ने सफ़र की शुरुआत करने का फैसला किया...
वो दोनों बेहद खुश थे और उन्हें अब मन्ज़िल के मिल जाने का पक्का यकीन हो चला था,पूरी तयारी और जोश के साथ एक दूजे का हाथ थामे उन्होंने चलना शुरू कर दिया,एक दुसरे को देखते,हंसते मुस्कुराते से,जब वो उसकी आँखों में गहरे से झांकता तो उसके गालों पर लाली छा जाती...उन्हें ऐसा लगता मानो पूरी दुनिया की ख़ुशी इन चार आँखों के दरम्यान में सिमट आई हो,और इसके सिवा दुनिया में कुछ है ही नहीं....
इसी हालात में अक्सर तो ऐसा होता की दोनों मन्ज़िल के बारे में भूल ही जाते और सफर के पेंचो खम में एक दूसरे के साथ का मदमस्त कर देने वाला अहसास उन्हें मदहोश किये रहता...एक दूसरे में खोये हुए से,थमे हुए,अहसास की उस मंज़िल पर पहुचे हुए जहाँ से कोई वापस नहीं आना चाहता लेकिन कुछ मजबूरियों के चलते वापस आ जाना ही पड़ता है....लेहाज़ा उन्हें भी वापस आना ही पड़ता और फिर दोनों सफर की मंज़िल तय करना शुरू कर देते थे...
एक दूसरे से बातें करते और मंज़िल के बारे में सोचते हुए बकिया ज़िन्दगी और वहां रहने सजाने और बिताने के बारे में घण्टो तक बातें किया करते थे....कभी कभी दोनों में किसी बात को लेकर मीठी बहस भी हो जाती थी जो आखिर में एक राय होकर खत्म भी हो जाती थी...
इसी सफर में एक मौक़ा ऐसा भी आया जब दोनों को अपनी मन्ज़िल सामने नज़र आने लगी...साफ़ शफ्फाक और एकदम आँखों के सामने बस चन्द क़दमो की दूरी पर,वो मंज़िल जिसकी तलाश में उन्होंने इतना लम्बा और खूबसूरत सफर तय किया था,दोनों दुगनी रफ़्तार से मन्ज़िल की तरफ बढ़ने लगे....एक दूजे का हाथ थामे वो उस जानिब बढ़ ही रहे थे की अचानक से उसकी हमसफ़र ने उसको रोक दिया...वो शख्स वहीं ठिठक कर खड़ा हो गया....और सवालियां निगाहें उसके चेहरे पर गड़ा दीं....
क्यों रोकती हो?मन्ज़िल सामने आ गयी है....
हाँ,देखा...
फिर?हमने इतना लम्बा सफर इसीलिए तो तय किया है जाना,इसी मंज़िल को हासिल करने के लिए जो हमारे सामने है...फिर रोकती क्यों हो?
हमसफ़र जवाब देती है-हाँ किया तो सही...लेकिन ज़रा उस सफ़र का भी सोचो...जो हमने एक दूजे के साथ तय किया है...उस सफ़र के अहसासात,एक दूसरे के साथ का लुत्फ़....और सबसे बढ़कर यह जानना कि दो लोगों के साथ और हमसफ़री के हक़ीक़ी मायने क्या होते हैं....मेरा तुमसे सवाल बस इतना है...क्या इस मंज़िल पर पहुच कर भी हम उस अहसास को दोबारा और वैसे ही कभी भी जी पाएंगे?जैसा की हमने इस सफ़र के दौरान जिया है?
उसकी बात जायज़ थी,शख्स एक सोच में पड़ गया,लेकिन हमसफ़र ने आगे बोलना जारी रखा,
ज़रा सोचो न जाना,हम आज इस मन्ज़िल के एकदम पास पहुच गए हैं....थोड़ी देर में हम इसके अंदर होंगे,कुछ आराम करेंगे,थोडा जश्न मनाएंगे,फिर उसके बाद?उसके बाद हमारे पास करने के लिए क्या बचेगा?ये जो इस सफ़र में हमने एक दूसरे को जिया है,एक दूसरे कि तकलीफों में हम साथ रहे हैं और खुशियों के जिन पलों को हमने सांसो में उतारा है अपनी,उन पलों को हम दोबारा पा सकेंगे क्या?
वो शख्स वहीँ पास एक पत्थर पर बैठ कर उसकी बातें ध्यान से सुनने लगा....हमसफ़र उसके क़दमों के पास बैठी और उसके जानू पर अपना सर रख के उसे सफ़र की मीठी यादों और तजुर्बों का ज़िक्र करने लगी.....
यह बड़ी अजीब सी स्थिति थी.....जिस मक़सद के लिए उन्होंने यह सफर अंजाम दिया था वो एकदम सामने होने के बाद उन्हें अपने मक़सद के बजाये वो रास्ता ज़्यादा भा रहा था जिसके ज़रिये वो यहां तक पंहचे थे,

"बेशक रास्ता मंज़िल नहीं हुआ करता,लेकिन मन्ज़िल हमेशा मन्ज़िल हो यह भी तो ज़रूरी नही न,महज़ कुछ पुराने ख्यालात की बिना पर किसी मन्ज़िल को मन्ज़िल और रस्ते को रास्ता क़रार दिया हुआ है हमने....लेकिन क्या यह ज़रूरी है कि हज़ारों साल पहले लिखी गयी जगह आज भी मन्ज़िल ही हो या फिर रास्ता वही रास्ता हो....."
हमसफ़र की बातें उसकद कानो के ज़रिये ज़ेहन की नसों में तैरती जा रही थीं....उसके नज़रिये में कुछ इंक़लाबी सा बदलाव आ रहा था...उसे सोचने पर मजबूर होना पड़ गया,जिसे वो अब तक मन्ज़िल समझ रहा था और उसकी याद में पागलों की तरग दौड़ लगाता फिर रहा था वो आज अगर पा भी ली तो क्या?
यह सफर अगर खत्म हो गया तो फिर आगे क्या होगा?जीवन का रोमांच और मक़सद फिर वो किसमें तलाश करेगा?कहाँ ढूंढेगा ज़िन्दगी को और कैसे?इन्ही ख्यालों की उधेड़बुन में दोनों देर तक खोये रहते हैं,एक बारगी कुछ फैसलाकुन अंदाज़ में सर झटके जाते हैं,मुस्कुराया जाता है...उदास हुआ जाता है और फिर बातें शुरू हो जाती हैं.....फिर एक बारगी अचानक उसके होंटो पर एक शांत सी मुस्कुराहट खेलने लगी है,वो अपनी हमसफ़र की आँखों में देखता है...नज़रें मिलते ही उसके होंटो पर भी वही मुस्कान तैर जाती है...मानो वो कह रही हो,मैं समझ गयी तुम्हारे मन की बात....यह बात बहुत कम लोग महसूस कर पाते हैं लेकिन सफर में एक मन्ज़िल ऐसी भी आती है जबकि लफ्ज़ कम पड़ जाते हैं या यूँ कहें की लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं रह जाती है...ऑंखें ही सब हाल बयान कर दिया करती हैं....बड़ा खूबसूरत होता है यह अहसास जिसे कि आज तक लफ़्ज़ों में बयान नहीं किया जा सका है, उनको बड़ा अच्छा लगता था हर बा जब ऐसा होता था,दोनों अपनी जगह से उठते हैं और एक दूजे का हाथ थामे एकबारगी होंटो पर होंट रखे एक दूसरे को कुछ देर तक चूमते रहते हैं,और मन्ज़िल के सामने दूसरी ओर को जाते हुए एक बेहद दिलकश लेकिन सुनसान और अंतहीन रास्ते की जानिब बढ़ जाते हैं....इस बिना किसी आने वाली मंज़िल के तय किये...मानो दोनों के दिल में यह सच बैठ गया हो...की यही सफर ही तो वो मंज़िल है...जिसकी उन्हें तलाश थी.....इसे खत्म नही होने देना है कभी.....वरना इसके साथ ही एक दिन वो भी खत्म हो जायेंगे......
कहीं पीछे छूट गयी उनकी वो पुरानी मन्ज़िल, जो दरअसल कभी उनकी मन्ज़िल थी ही नहीं......उनको जाते हुए देखती है....मानो उन दोनों से कह रही हो कि....मुबारक हो तुम्हें! आज तुमने एक दूजे को खुद से जुदा होने से बचा लिया है,और अपने रिश्ते को ज़िंदा ओ जावेद कर दिया है......आखिरी मर्तबा पीछे मुड़कर देखने के बाद फिर एक दूसरे में खोये दोनों अपने अंतहीन रास्ते पर आगे बढ़ जाते हैं......

~इमरान~

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

मंदिर वहीँ बनायेंगे

सुन ले ओ भगवन,
ओ सबसे बलवान,
वही पुरानी तान,
फिर अयोध्या आएंगे
मन्दिर वहीँ बनाएंगे,
तारीख़ नहीं बताएँगे,
आंदोलन करवाएंगे,
अदालतें बिठवायेंगे,
हम दंगे करवाएंगे,
चुनाव जीते जायेंगे,
चन्दा जमा करवाएंगे,
महल अपने बनवायेंगे,
टाइल्स विदेशी लगवाएंगे,
खूब शिलाएं लाएंगे,
उनसे अपने मकां बनवाएंगे,
तुम चिंतित बिलकुल मत होना,
तम्बू में आराम से सोना,
टाट का ले लेना बिछौना,
बिन बिजली अँधेरे में जीना,
दूध नहीं है पानी पीना,
हम तो संसद बसाएंगे,
मंत्री बने बनाएंगे,
दिल्ली में छा जाएंगे,
काला धन न लाएंगे,
मुर्ख जनता को बनाएंगे,
तुम शांति से प्रतीक्षा करो,
मायूसी पे न कान धरो,
ये काम तो निपटा लें पहले,
तिजोरियां खाली हो गयीं फिर,
इनको तो भर लें हम पहले,
बाद में तेरी सोचेंगे,
तब तक ये आश्वासन ले लो,
उम्मीद का एक वादा ले लो,
अच्छे दिन की आसा ले लो,
मन में तुम भी सपना रख लो,
दिल से कहते हैं ये बात
फिर एक बार फिर एक बार,
सुन लो मेरी जान लला,
जनमन के भगवान लला
ओ रामलला हम आएंगे,
मंदिर वहीँ बनाएंगे....

~इमरान~

रविवार, 30 नवंबर 2014

रिक्शे वाले, लाल सलाम

का भईया रिक्शे वाले,लाल सलाम!
जी भईया?
लाल सलाम का होअत है जानित हौ?
के का?
अरे लाल सलाम जनित हौ की नाय?
हाँ जानित काहे न हैं!!
अच्छा! का होत है बताओ?
ऊ वइसने होत है जय रामजी के जईसे!
केके जईसे?
अरे वही भाय,जय रामजी की,आदाब,सतसिरिकाल की जईसने टैप होअत है.....
बस बस!तब ठीक बा,चला अब......

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

मोमबत्तियां और बल्ब

राजस्थान मेघदूत में प्रकाशित (चित्र संलग्न)


मोमबत्ती और बल्ब की भी एक अजब कहानी है,बड़ा अजीब सा रिश्ता है , इतिहास भरा पड़ा है इनके आपसी रिश्ते की कहानियों से, जी हाँ मोमबत्ती और बल्ब का इतिहास, जब जब मोमबत्तियों की बस्ती में कोई बल्ब आया उसे परेशानियों का सामना करना पड़ा है,लेकिन बल्ब ने इन परेशानियों से हार मान कर रौशनी देना नहीं छोड़ा,ऐसे ही एक बल्ब की क़ुरबानी की कहानी आज आपको सुनाता हूँ ,
बहुत समय पहले की बात है,मोमबत्तियों के एक देश में कहीं से एक बल्ब रहने आया,एक शहर में छोटी सी खोली बना कर रहने लगा, शहर के और आस पास की मोमबत्तियां उसे बड़ी अजीब नज़रों से देखतीं,उसके बारे में तरह तरह की कहानियां बनतीं, जब बल्ब बाहर निकलता तो कुछ आवारा किस्म की मोमबत्तियां उसपे फब्तियां कसतीं,उसे ताने दिए जाते, छोटे छोटे बच्चे और जवान मोमबत्तियां अक्सर बल्ब की तरफ आकर्षित हो जाते थे,उन्हें बल्ब की तेज़ चमक बड़ी अच्छी लगती थी, वो भी अपने वजूद में उस बल्ब की रौशनी पाना चाहते थे ,इस बात से शहर की चालाक सयानी राजनैतिक मोमबत्तियां खतरा महसूस करती थीं, की अगर सारी जवान मोमबत्तियां बल्ब की तरफ आकर्षित होकर उसकी तरह की हो गयीं तो संसार से मोम बत्तियों का प्रभुत्व ख़त्म हो जायेगा,
संसार को अँधेरे में रौशनी देने का उनका गौरवशाली इतिहास किसी बल्ब के क़दमों की गर्द के तले दब कर रह जायेगा,लिहाज़ा मोमबत्तियों के अस्तित्व के लिए बल्ब का खत्म होना बेहद ज़रूरी है, इस आशय को अमली जामा पहनाने के लिए मोमबत्तियों ने एक दिन एक ख़ास जगह पर कुछ ख़ास बुद्धिजीवी मोमबत्तियों की बैठक बुलाई,
उस बैठक मे बस्ती की सभी बड़ी बड़ी मोमबत्तियां शामिल हुई थीं,सभा में व्यापारी संघ की मोमबत्तियां सबसे आगे बैठीं थीं, उनके पीछे बुद्धिजीवी, सामाजिक मोमबत्ती ,डॉक्टर वकील मोमबत्तियां,पत्रकार मोमबत्तियां और धर्मगुरु मोमबत्तियां इत्यादि मौजूद थीं,
कुछ दो चार युवा मोमबत्तियां भी थीं जो युवक मोमबत्ती संघों या संगठनों की नेता मालूम होती थीं, इनका काम होता था बड़ी मोमबत्तियों के कार्यक्रमों में युवा मोमबत्तियों की भीड़ इकट्ठी करना,इस लिहाज़ से यह तत्काल मोमबत्ती सियासत में काफी अहम् स्थान रखते थे, इन्हें सभी बड़ी और "बुज़ुर्ग" मोमबत्तियों का खुला वरदहस्त प्राप्त था,बड़ों के दीगर जरायम में इनका हिस्सा भी तय शुदा होता था... बहरहाल किसी तरह से यह मीटिंग शुरू हुई, एक सबसे बूढी मोमबत्ती को "लोकतान्त्रिक सर्वसम्मति" से महान मोमबत्ती सभा का अध्यक्ष मनोनीत किया गया,
अध्यक्ष की अनुमति से एक एक कर के वक्ताओं ने भाषण देना शुरू किया,
पहला वक्ता बोला -"दोस्तों,हम मोमबत्तियों का एक गौरवशाली इतिहास रहा है, सालों से हमारे पूर्वज इस संसार को रौशनी देते चले आ रहे हैं,आज हमारे बीच कोई अजीब सा बल्ब नाम का प्राणी आ गया है,यह बल्ब किसी पागल सनकी इंसान का इजाद किया हुआ एक हथियार है जो खुद को वैज्ञानिक कहता है और हमारी रूढ़ियों और परम्पराओं को पाखण्ड और दिखावा कहता है, हमारे गौरवशाली इतिहास को दरकिनार करते हुए आज वो हमारे अस्तित्व को ही समाप्त कर देना चाहता है"
इस भाषण की समाप्ति पर खूब तालियाँ बजीं, फिर अध्यक्ष की अनुमति से एक दूसरी बूढी मोमबत्ती ने बोलना शुरू किया, -"प्यारे साथियों ! आप अच्छी तरह से जानते हैं की विदेशी विधर्मी ताक़तें हमेशा से हम मोमबत्तियों के गौरवशाली उज्जवल इतिहास से जलती और कुढती रही हैं, उनसे हमारी तरक्की और खुशहाली बर्दाश्त नहीं होती है, लिहाज़ा उन्ही पश्चिमी देशों ने आज साजिशन हमारे बीच इस बल्ब को भेज दिया है ताकि हमारी नौजवान पीढियां इस बल्ब के चक्कर में आकर अपना वजूद अपना रौशन माज़ी भुला बैठें और इसके पीछे इस जैसे हो जाएँ,आज हम सबको इस साजिश का मुकाबला करने की ज़रुरत है वरना हमारा अस्तित्व समाप्त हो जायेगा और हमारी आने वाली नस्लें मोमबत्ती होकर रह जाएँगी"
हॉल में ज़ोरदार तालियाँ बजीं, सारी मोमबत्तियों ने एक सुर में अपनी लौ फडका कर इस बात का अनुमोदन किया,
इसके बाद कुछेक वक्ताओं ने और अपनी राय रखी, नौजवान संघ के एक छात्रनेता ने खड़े होकर सभी वरिष्ठ मोमबत्तियों को विश्वास दिलाया की युवाओं को बल्ब के प्रभाव में आकर भटकने से रोकना उसकी ज़िम्मेदारी है और वो अपने जिस्म के मोम का आखिरी कतरा तक बहा कर इस कर्तव्य का पालन करेगा,
व्यापारी संघ की एक नेता मोमबत्ती ने कहा की वो बल्ब की सम्भावित सप्लाई रोकने के लिए बाज़ार को नयी और सजीली आकर्षक भड़काऊ मोमबत्तियों से भर देगा ताकि लोग बल्ब की ज़रूरत ही न महसूस करें,
शराब बनाने का काम  देखने वाली एक मोमबत्ती ने कहा की वोह घर में मोमबत्ती रखने वाले लोगों को कम कीमत पर अच्छी शराब देगा और बल्ब के प्रभाव वाले लोगों को महंगी देगा,
पत्रकार और बुद्धिजीवी मोमबत्तियों ने बल्ब के खतरों और साजिश के खिलाफ लम्बे लम्बे लेख,ख़बरें और किताबें लिखने का आश्वासन दिया,
एक लम्बी दाढ़ी और चोगे वाली मोमबत्ती ने कहा की वोह बल्ब के विरुद्ध फतवा जारी करके उसे इस्तेमाल करने वालों को धर्म और बिरादरी से ख़ारिज करवा देगी, नज़दीक बैठी कुछ तिलकधारी , क्रॉसधारक,पगड़ी वाली और वैसी ही तीन चार अजीब अजीब वेशधारी मोमबत्तियों ने भी दाढ़ी चोगे वाली मोमबत्ती के प्रस्ताव का समर्थन किया और खुद भी वैसा ही करने का भरोसा दिलाया,
सभा अपने तर्ज़ पर चल ही रही थी कि इसी बीच एक मुखबिर मोमबत्ती बीच सभा में दौड़ती हांफती आई और उपस्थित लोगों से कहा की बल्ब अब अपनी हद से आगे बढ़ गया है, उसने अपने पड़ोस में रहने वाली चार मोमबत्तियों को भी बल्ब बना डाला है और अब वो चारों उसके साथ मिल कर चौक में बल्ब के साथ मोमबत्ती संस्कृति के खिलाफ भाषण दे रहे हैं
यह खबर सुनकर उपस्थित मोमबत्तियों के समुदाय में आक्रोश की लहर दौड़ गयी, सब एक सुर से मार दो-काट दो की सदायें बुलंद करने लगे,मंच पर बैठी नेता मोमबत्तियों ने जनाक्रोश को भांपते हुए तुरंत अपना सुर "बहिष्कार से संहार" की तरफ मोड़ दिया,
अध्यक्ष का इशारा पाकर एक अत्यंत वरिष्ठ मोमबत्ती ने माइक सम्हालते हुए कहा -"प्यारे भाइयों,अब बात बहुत बढ़ चुकी है,बल्ब ने हमारी सारी आशंकाओं को सही साबित करते हुए अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया है,यदि अभी के अभी इस बल्ब को सबक नहीं सिखाया गया तो यह हमको और हमारे अस्तित्व को हमारी संस्कृति सहित ज़मीनदोज़ कर डालेगा"
उधर सारी दाढ़ी चोगे तिलक क्रॉस पगड़ी वाली मोमबत्तियां चीख चीख के बुलंद आवाज़ में बल्ब के विरुद्ध भाषण देने लगीं, कुछ गायकों ने वीर रस की कविताएँ गानी प्रारंभ कर दीं...
भीड़ पहले से ही आक्रोश में नारे लगा रही थी,इतने में इसी भीड़ में से कुछ युवा मोमबत्तियों ने तलवारें लहरानी शुरू कर दीं, और तेज़ नारेबाजियों के साथ चौक की तरद दौड़ लगा दी, भीड़ भी उनके साथ हो ली,
चौक पर बल्ब अपने उन चार नए नए बल्ब बने साथियों के साथ मौजूद था और कुछ एक मोमबत्तियों को लेकर बैठा कुछ समझा रहा था-"आप लोग भी इनकी तरह मोमबत्ती से बल्ब बन जाओ, इससे आपकी प्रकाश देने की क्षमता बढ़ेगी,आप अधिक आयु जियोगे और बेहतर जीवन मिलेगा"
इतने में हजारों मोमबत्तियों की हाहाकारी भीड़ ने उन पर हमला कर दिया,भीड़ आती देख श्रोता मोमबत्तियां तेज़ी से गलियों में भाग कर कहीं गायब हो गयीं,चार नई नयी बल्ब बनी एक्स मोमबत्तियों को भीड़ ने वहीँ मौत के घाट उतार दिया, बल्ब को पकड़ कर मुखिया मोमबत्ती के सामने पेश किया गया,मुखिया ने उसे जेल भेजने का आदेश दे दिया , कुछेक नौजवान मोमबत्तियों ने उसे भी वहीँ मार डालना चाह लेकिन मुखिया मोमबत्ती ने "न्यायिक प्रक्रिया" का हवाला देते हुए उसे अदालत के समक्ष पेश करने को कहा,
अदालत में वो दाढ़ी,चोगे,क्रॉस,पगड़ी और तिलक वाली सारी मोमबत्तियां जज की कुर्सी पर बैठीं थीं, एक हफ्ते तक मुक़दमा चला,सरे काजियों ने एक सुर में कहा की हमारे महान मोमबत्ती ग्रंथों के नियमों के मुताबिक बल्ब को मृत्युदंड मिलना चाहिए क्यूंकि उसने ने एक नयी व्यवस्था कायम करने की कोशिश की है जो न केवल देश और धर्म के विरुद्ध है बल्कि मोमबत्तियों के महान इश्वर "मशाल" के खिलाफ विद्रोह भी है,
इसकी सबसे छोटी सजा फांसी ही है,हालाँकि अपराधी के दुस्साहस को देखते हुए यह सज़ा कम है लेकिन हम इससे अधिक सज़ा दे भी नहीं सकते,
बल्ब ने बड़ी अदालत में गुहार लगाईं,लेकिन वहां भी उसकी सज़ा को बरकरार रखा गया...अंत में फैसला यही हुआ की बल्ब को बीच चौराहे पर जनमानस के सामने फांसी दे दी जाएगी....बल्ब यह सुन कर उदास नहीं हुआ बल्कि मोमबत्तियों की मूर्खता पर हँसता रहा...
फिर एक अख़बारों में बड़ी बड़ी हेडलाइंस में खबर छपी-"छह माह की न्यायिक प्रक्रिया के बाद राजद्रोही बल्ब को बीच चौराहे पर फांसी"
सम्पादकीय पन्नों पर बल्ब को मिलने वाली न्यायिक सुविधाओं,बढ़िया वकीलों और जेल में मिलने वाले अच्छे खाने का ज़िक्र करते हुए मोमबत्ती राज्य की दरियादिली और न्यायप्रियता की दिल खोल कर तारीफ की गयी, सालों तक लोग अपने बच्चों को बल्ब के अपराध के किस्से सुनाते रहे,स्कूलों की किताबों में बल्ब को खलनायक लिखा गया, बुद्धिजीवियों/पत्रकारों की कलम बल्ब को राजद्रोही और मुजरिम कहती रहीं....

~इमरान~