मंगलवार, 9 जून 2015
दिल की आवाज़ का जवाब
आवाज़ का जवाब
हर बार जो
पलट आती थी
कहीं किसी
निर्वात से टकराती
लौट आया करती थी
तनहा अकेली सी
इस बार वो आई है
मय इक जवाब के
जवाब की शक्ल में
एक मुस्कुराता चेहरा
एक जोड़ी मासूम आँखें
और इक प्यारा
अपना सा लगता
हंसीं वजूद लेकर
आवाज़ पलटी तो है
वो लौटी भी है
इस बार मगर
तन्हा नहीं
मेरे दिल के लिए
आई है वो
अमन लेकर.....
हेलमेट और मेरी आपबीती
आमतौर पर मैं हेलमेट का प्रयोग नही करता, जौनपुर से लखनऊ जाते वक़्त भी पूरे रास्ते बिना हेलमेट के ही गया था लेकिन वापसी चूँकि शाम की थी और पहुँचते पहुँचते रात हो जानी थी अतः कुछ सोचकर वहीं रास्ते से एक हेलमेट खरीदी और पहन ही ली ।
4 बजे लखनऊ से जौनपुर के लिये निकला और 6 या 6:30 पर सुल्तानपुर रोड तक पहुँच गया था, अब तक हल्का हल्का अँधेरा हो चला था ।
तीन दिन बाद आपरेशन हुआ...हड्डी में ड्रिलिंग करके चार एक्सटर्नल स्पोर्ट लगाये गए जो पूरे एक महीने तक लगे रहे ।
इस घटना के लगभग एक हफ्ते बाद बाद दादा ने मुझे मेरा हेलमेट दिखाया जिसके बींचोबीच एक लम्बा सा लेकिन हल्का क्रैक पड़ा हुआ था।
क़ब्ल तुम्हारे
जब जब मेरी क़लम इश्क़ लिखेगी उसका मतलब फ़क़त तुम होगी.....
कैसी साहिब से रवादारी है
इन सबके बीच "भक्तजन" आज भी हर हर मोदी ही कर रहे हैं, ठीक उसी तरह जैसे दस साळ आप लोग सोनिया जी राहुल जी ज़िंदाबाद करते रहे थे ।
तुम तन्हा नही हो
कई नींद से खाली
कभी सांसो से
होता है नदारद जीवन,
इसका मतलब मगर
हरगिज़ ये नही ,
की न आएगी
सुबह उजली कोई जाना
तुम सुनो मेरी बात
इक काम करो तुम
अपने दिल की सभी
तल्ख और तकलीफदेह
यादों को माज़ी की
मेरे हवाले कर दो
मैं इन्हें दफ़्न ज़मीं में करके
सुबह ए नौ की
तज़ादमी के सारे लम्हात
उतार दूंगा तुममें
चीनी मिटटी के कप में फिर
किसी गर्म चाय की मानिंद
उलट के तुम्हारे दर्द
सारी टीसें और तकलीफें
पी जाया करूंगा
ये अवसाद की पैरहन
फैंक वीरान किसी सहरा में
लिपट के मेरे काँधे से
तुम जी भर के किया करना
शिकवा ए अमन जाना
मैंने किया है न
सच्चा वादा तुमसे,
कोई तकलीफ तुम्हे,
सहने दूंगा नहीं तन्हा जाना....
शनिवार, 6 जून 2015
ज़मीं पा कब उतरोगे साथी
तुम आखिर
कितना लिखोगे साथी
ये सिद्धांत वो प्रयोग
यह दल वो दलदल
ये लाइन पर हैं
तो वो बे-लाइन के
तुम आखिर कब तक
और कितना लड़ोगे साथी
ट्रेड यूनियन की तुम्हारी
ये सालाना हड़तालें
तुम्हारे ये समझौतावादी संघर्ष
तुम आखिर कब सुधरोगे
तुम कितना पढ़ोगे साथी
अच्छा इतना ही बता दो
कि इतना पढ़ लिखकर
मार्क्सवाद के प्रोफ़ेसर बन
तुम आखिर क्या करोगे साथी,
नक्सलबाड़ी से कुछ
बूढी माओं ने अपनी
पथराई सी आँखों से
तुम्हे भेजा है लाल सलाम
उसका जवाब कब दोगे साथी
खुद को माओवादी कहकर
क्यों शर्मिन्दा करते हो
तुम माओ की शिक्षा को,
उनकी वास्तविक शिक्षा पर
तुम आखिर कब चलोगे साथी
एक साइंसी तजुर्बे के साथ
उन मज़दूरों के बीच
शोषितो वंचितों पिछड़ों
और इन दलितों के पास
तुम आखिर कब जाओगे साथी
क़लम बहुत घिस चुके हो
अब किताबें पलटना भी
बंद ही कर दो तुम
मुझे तो बस इतना बता दो
ज़मीं पर कब उतरोगे साथी
ज़मीं पर कब उतरोगे साथी....
~इमरान~
ज़मीं पा कब उतरोगे साथी
तुम आखिर
कितना लिखोगे साथी
ये सिद्धांत वो प्रयोग
यह दल वो दलदल
ये लाइन पर हैं
तो वो बे-लाइन के
तुम आखिर कब तक
और कितना लड़ोगे साथी
ट्रेड यूनियन की तुम्हारी
ये सालाना हड़तालें
तुम्हारे ये समझौतावादी संघर्ष
तुम आखिर कब सुधरोगे
तुम कितना पढ़ोगे साथी
अच्छा इतना ही बता दो
कि इतना पढ़ लिखकर
मार्क्सवाद के प्रोफ़ेसर बन
तुम आखिर क्या करोगे साथी,
नक्सलबाड़ी से कुछ
बूढी माओं ने अपनी
पथराई सी आँखों से
तुम्हे भेजा है लाल सलाम
उसका जवाब कब दोगे साथी
खुद को माओवादी कहकर
क्यों शर्मिन्दा करते हो
तुम माओ की शिक्षा को,
उनकी वास्तविक शिक्षा पर
तुम आखिर कब चलोगे साथी
एक साइंसी तजुर्बे के साथ
उन मज़दूरों के बीच
शोषितो वंचितों पिछड़ों
और इन दलितों के पास
तुम आखिर कब जाओगे साथी
क़लम बहुत घिस चुके हो
अब किताबें पलटना भी
बंद ही कर दो तुम
मुझे तो बस इतना बता दो
ज़मीं पर कब उतरोगे साथी
ज़मीं पर कब उतरोगे साथी....
~इमरान~