रविवार, 26 अप्रैल 2015

अच्छी तस्वीर अब नही आती

अच्छी तस्वीर अब नही आती
मेरी सूरत संवर नही पाती

बाल कितने भी मैं सही कर लूँ,
ज़ुल्फ़ें रूकती नहीं हैं बिखर जाती

मेरे कपड़े भी सब सिकुड़ से गए
इनसे सिलवट भी अब नही जाती

पाँव में जूतियां तो आती हैं
उमंग क़दमों में पर नही आती

इत्र चाहे लगा लूँ मैं जितने
खुशबू मुझसे तेरी नही जाती

मेरा मफलर गले में रहता है
इससे सर्दी लेकिन नही जाती

घेरे रहती हैं मुझको यूँ फ़िक्रें
शिकन पेशानी से अब नही जाती

करता रहता है दर्द मेरा तवाफ़
याद माज़ी की मिट नही पाती

हंसी तो हो गयी थी तभी गायब
अब तो मुस्कान भी नही आती

~इमरान~

अवसाद की पैराहन

रातें होती हैं
कई नींद से खाली
कभी सांसो में
होता है नदारद कोई,
मतलब इसका लेकिन
हरगिज़ ये नही होता,
की न आएगी
सुबह उजली नई
अपने हस्बे मामूर
तुम बस,
मेरा इक काम करो
दफन करके
तल्ख यादों को माज़ी की,
वक़्त ए सुबह की
तज़ादमी के खुद में
उतार लिया करो लम्हात
माना होते हैं उनमे
कई शिकवे ओ गिले
कुछ गलतियां भी,
चीनी मिटटी के कप में
किसी गर्म चाय की मानिंद
उलट कर उसको
पिला दिया करो मुझको
वो तल्खियाँ सारी,
अपनी वो सारे
दर्द और तकलीफ,
अपने अवसाद की पैराहन,
लपेट कर मुझमे,
मुझसे खूब तुम
किया करो शिकवे,
मैंने किया है न
सच्चा वादा तुमसे,
कोई तकलीफ कभी तुमको,
न दूंगा सहने कभी तन्हा जाना....

~इमरान~

अवसाद की पैराहन

रातें होती हैं
कई नींद से खाली
कभी सांसो में
होता है नदारद कोई,
मतलब इसका लेकिन
हरगिज़ ये नही होता,
की न आएगी
सुबह उजली नई
अपने हस्बे मामूर
तुम बस,
मेरा इक काम करो
दफन करके
तल्ख यादों को माज़ी की,
वक़्त ए सुबह की
तज़ादमी के खुद में
उतार लिया करो लम्हात
माना होते हैं उनमे
कई शिकवे ओ गिले
कुछ गलतियां भी,
चीनी मिटटी के कप में
किसी गर्म चाय की मानिंद
उलट कर उसको
पिला दिया करो मुझको
वो तल्खियाँ सारी,
अपनी वो सारे
दर्द और तकलीफ,
अपने अवसाद की पैराहन,
लपेट कर मुझमे,
मुझसे खूब तुम
किया करो शिकवे,
मैंने किया है न
सच्चा वादा तुमसे,
कोई तकलीफ कभी तुमको,
न दूंगा सहने कभी तन्हा जाना....

~इमरान~

हमारी मौत की झूठी खबर

हमारी मौत की झूठी खबर उड़ाता है
वो रण में टिकता नही है तो भाग जाता है

हमारे सामने पड़ने की उसे नही हिम्मत
जो आ भी जाए तो फ़ौरन नज़र झुकाता है

हमसे दुश्मनी करके सीखी है शराफत उसने
हमें न ज़िल्लत ओ रुसवाई में लुत्फ़ आता है

हुनर जो सीखा था नादाँ ने रसम निभाने का
हमारा तीर हमी पर वो अब चलाता है

वो तकल्लुफ़ी में जो हमने लिया नही बदला
भूल गए हैं हम ये धोखा उसे सुहाता है

यूँ छोटी छोटी सी जंगों के हम नहीं क़ायल
जो सर गिरे न तो फिर मज़ा ना आता है

किस तरह यूँ शराफत से लड़ी जाती जंगें
ये हमसे सीखो हमी को हुनर ये आता है

बगैर वार के गर्दन क़लम हंसी से करी
जो वार कर दें हम तो सैलाब आता है

शर्म से डूब ही मरा था भरी वो महफ़िल में
ये हमने पूछा था अब कौन तुमको भाता है

वार ख़ामोशी का करके किये हैं क़त्ल कई
उसे पता है तभी वो हमें बुलाता है.....

~इमरान~

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

नई ज़िन्दगी के नाम

इक तय ढर्रे पर
चली आ रही है
दस से पांच की
वो उजरती गुलामी
जकड़ी हुई सरमायेदारों के
वहशी पंजो में
छटपटाती सी ज़िन्दगी
उसे समझ बैठी है
अपने जीवन की नियति
इसे ये भी नहीं मालूम
इसके लिए तो
सारा जहान रक्खा है
क़ुदरतों का निज़ाम रक्खा है
लेकिन निज़ाम ने इसे
महदूद कर दिया
किसी उजरती गुलामी में
इसे बताना होगा
कि ये दुनिया
उनकी नही हमारी है
इसमें हम सबकी हिस्सेदारी है
यही चिंगारी सुलगा कर
दिलों में उनके
लाल मशाल जलानी है
हम बहुत जी लिए गुलामी में
अब तो दुनिया नई बनानी है ....

~इमरान~

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

भूत बिल्ली

अन्धेरा बढ़ चला है और इस वक़्त इस मेरे घर के इस विशाल आँगन में लगी सारी सोडियम लाइट्स रौशन होकर किसी दिन का सा मंज़र पैदा कर देती हैं...
दरमियान में खिली रात की रानी में मौसम के चलते कुछ गिने चुने ही आ सके फूलों पर पड़ती इनकी तेज़ रौशनी लगता है मानो कई नन्हे सितारों पर रौशन सूरज अपनी छटा बिखेर रहा है.....

मैं इसी दरख्त के पास आरामकुर्सी पड़ी पाकर बैठ गया था,कुछ देर में चाय भी मिल गयी, अम्मी को पता होता है कि यह मेरी चाय का वक़्त है,लिहाज़ा बिन कहे मिल जाया करती है, सामने छत की मुंडेर पर कहीं से दो फख्ताएं आकर बैठी हुई थीं, अमूमन परिंदे इस वक़्त अपने अपने घोंसलों में आराम कर रहे होते हैं लेकिन ना जाने क्यों यह जोड़ा अभी तक बाहर ही मौजूद था और छत की मुंडेर पर आके बैठ गया था, अपनी आवाज़ में चहचहाते हुए, फाख्ता की आवाज़ बिलकुल ऐसी होती है जैसे किसी इंसान की हंसी, इसलिए इसे लाफिंग डोव भी कहा जाता है...

पुराने ज़माने में जब शाम ढ़ले किसी सुनसान जगह पर झुण्ड में फख्ताएं बोलतीं थीं तो लोगों को अक्सर भूत प्रेत का भ्रम हो जाया करता था,मुहल्ले के आसपास के बड़े बूढ़े कई किस्से भी सुनाया करते ,

जैसे एक किस्सा किसी खूबसूरत औरत का था जो ज़ोर ज़ोर से हंसा करती थी,उसकी आवाज़ उसके पड़ोस में रहने वाले एक पहुंचे हुए बाबा को परेशान करती और उनकी इबादत में खलल पड़ता,औरतों की आवाज़ घर से बाहर नही आना चाहिए लिहाज़ा एक दिन उस बाबा ने नाराज़ होकर उस औरत को परिंदा बना दिया...
बचपन में हम समझ न पाते की खूबसूरत औरत के हसने की आवाज़ का इबादत में खलल से क्या ताल्लुक़ था... अगर वो औरत ज़ोर से हसती थी तो उस बाबा को इससे क्या दिक़्क़त हो सकती थी और अगर औरत की आवाज़ घर के बाहर आ जाये तो इससे मआशरे को क्या नुकसान हो सकता था...घरों में पली गाय भैंसे जब रंभाती हैं तो उनकी आवाज़ दूर तक गूंजा करती है... उससे किसी को कोई एतेराज़ न होती लेकिन घर में रहने वाली औरत की आवाज़ अगर बाहर चली जाए तो मज़हब पर खतरा मंडराने लगता है...बहरहाल हमारा बालमन उस वक़्त तक यह अजीब सा लॉजिक समझ नहीं पाता और न कभी हमारे घर में इस तरह का माहौल होने के चलते इसपर कभी बड़ों के मुंह से कोई चर्चा सुनने को मिलती कि इसके पीछे क्या तर्क हो सकता था...लिहाज़ा बचपन की कई पहेलियों की तरह ये पहेली भी अनसुलझी रह गयी...

हाँ लेकिन इस भूत प्रेत के भ्रम के लिए फाख्ता अकेली ज़िम्मेवार नहीं है,अक्सर कुछ अजीब हालात भी इसके लिए ज़िम्मेदार होते हैं... कैसे ? वो मैं बताता हूँ, ये तक़रीबन बारह साल क़ब्ल की बात है, वेस्ट इंडीज में कोई सीरीज चल रही थी, इंडिया सेमिफाइनल तक पहुँच चुकी थी,उस वक़्त तक मैच फिक्सिंग जैसे केस सामने नही आये थे लिहाज़ा हमारी क्रिकेट में रूचि बनी हुई थी, अम्मी तो सो चुकी थी लेकिन हम और पापा जाग रहे थे, रात का लगभग एक बजा था और चाय का तीसरा दौर चल रहा था । तभी अचानक दरवाज़े पर धड़ धड़ की आवाज़ सुनाई दी, जैसे बाहर से कोई दरवाज़े पर ज़ोर ज़ोर से हाथ मार रहा हो, पापा और मैं चौंके , इस वक़्त इतनी रात को कौन हो सकता है...

हालांकी पापा के सक्रीय राजनिति में होने के चलते अक्सर रात बिरात लोगों का आना जाना होता रहता था लेकिन फिर दरवाज़े के बाहर कॉल बेल लगी हुई थी, और दरवाज़ा पीटने का अंदाज़ भी कुछ अजीब सा था....मैंने दरवाज़ा खोलकर देखना चाहा कि कौन है लेकिन पापा ने रोक दिया...वो खुद गए और पहले दरवाज़ा खोलने के बजाए मैजिक ऑय से देखना चाहा की कौन है...लेकिन सामने कोई नज़र ना आया...मैंने भी झाँका लेकिन सामने बल्ब की तेज़ रौशनी होने के बावजूद कोई नज़र ना आता था...

हम बाप बेटे दोनों अंधविश्वास से सख्त चिढ़ते थे लेकिन फिर भी उस रात बड़ी अजीब स्थिति पैदा हो गयी थी...यानी दरवाज़ा रह रह कर धड़ धड़ बोल रहा था लेकिन सामने कोई दिखाई ना देता था...हम दोनों अब्बा बेटे क्रिकेट भूल कर एक दूसरे को ताक रहे थे कि अब क्या किया जाये...दरवाज़े की आवाज़ में कोई फर्क न था और रह रह कर थोड़ी थोड़ी देर पर आवाज़ आये जाती थी...

पापा ने दरवाज़े के पास लगी खिड़की खोली,और उससे झांक कर देखा कहीं ऐसा तो नही कि कोई दरवाज़ा बजाता हो और फिर मैजिक ऑय के सामने से हट जाता हो...लेकिन खिड़की से झाँकने पर भी कोई न दिखा और आवाज़ बदस्तूर जारी रही...

मैंने पुलिस में कॉल करने की सलाह दी ही थी कि इतने में पापा की नज़र खिड़की से झांकते हुए दरवाज़े की चौखट पर पड़ गयी, देखा तो वहां हमारी रोज़ी खड़ी हुई थी और अपने अगले पैरों से लगातार दरवाज़े को हिला रही थी...रोज़ी हमारी हट्टी कट्टी पर्शियन बिल्ली थी जो उस रात ना जाने कैसे घर के बाहर निकल गयी थी और इधर उधर आवारगी करने के बाद वापस अंदर घुसने का रास्ता तलाश कर रही थी ,क्रिकेट के चक्कर में हमें रोज़ी का ख्याल भी न रहा जो अक्सर घर के बाहर निकल इधर उधर घुमक्कडी कर लिया करती थी

दरवाज़ा चूँकि लोहे का था इसलिए उसका नाज़ुक सा धक्का भी तेज़ आवाज़ पैदा करने के लिए पर्याप्त था, पापा ने दरवाज़ा खोला, रोज़ी दौड़कर अंदर आई और सोफे पर अपनी निर्धारित जगह कूद कर लेट गयी...पापा और मैं वापस अंदर आये और फिर जब थोड़ी देर में हमारी आँखे मिली तो अपनी अपनी जगह बैठ हम काफी देर तक हसते रहे.....

सोमवार, 6 अप्रैल 2015

गरीब लोग

बहुत समय पहले की बात है जब जम्बूद्वीप में गरीब नामक जानवर रहा करते थे, इनके रहन सहन का स्तर बेहद गन्दा और घटिया होता था, फ़टे नुचे मैले कुचैले कपड़े पहनने वाले ये लोग निहायत असभ्य और बद्तमीज़ हुआ करते थे, न इन्हें पढ़ना लिखना आता था और ना ही देश दुनिया के नियम क़ायदे ही यह जानते थे ।

इन गरीबों की सबसे बुरी आदत थी हर वक़्त रोते रहना, हर बात पर रोना, यानि अगर आप सुबह सुबह उठकर इनकी शक्ल देख लें तो आपका भी सारा दिन रोते हुए बीत जाये ।

गरीब एक नंबर के मुफ़्खोर होते थे, मुफ़्त का अनाज,मुफ़्त की सब्सिडी, मुफ़्त की दवा यानी हर वो चीज़ जो इंसान के लिय ज़रूरी होती है वो इन गरीबों को मुफ़्त में चाहिए रहती थी ।

सरकार अगर ये चीजें इन्हें उपलब्ध करा देती तो ये और दूसरी अन्य चीजों के लिए रोना शुरू कर देते मसलन रोज़गार,शिक्षा,आवास,यानि ऊँगली थमाओ तो ये सीधा हाथ पकड़ लेते थे ।

अब बताइये, कोई किसी को कितनी मुफ़्त सुविधाएं उपलब्ध करा सकता है, ये तो सरकार की सहृदयता थी कि वो इन्हें कुछ सुविधाएँ दे दिया करती थी, वरना क़ायदे से तो इन्हें एक धेला भी नहीं दिया जाना चाहिए था ।
लेकिन कोई भला किसी की मदद भी कब तक कर सकता है? 

धीरे धीरे अब सरकार की भी हिम्मत जवाब दे रही थी, देश के सम्मानित उद्योगपति,बुद्धिजीवी और अधिकारी वर्ग 'अपने धन' को यूँ इस तरह गरीब नामक प्राणी की मुफ्तखोरी में 'ज़ाया' होते देख दुखी हो रहा था, इनके दुखी होने की आंच धीरे धीरे सरकार का गाल भी जलाने लगी,लिहाज़ा 'सिस्टम' को हरकत में आना पड़ा ।

सरकार ने अपने सबसे क़ाबिल अफसरान की एक मीटिंग बुलाई,अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि निर्धारित समय के भीतर देश में गरीबी के समस्त कारणों पर अध्यन करके एक संक्षिप्त और स्पष्ट रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाये,अधिकारीयों ने कान लगाकर सरकार की बात सुनी और काम पे लग गए, 
तय वक़्त पर रिपोर्ट साहेब की टेबल पर थी।

गरीबी के कारणों का समग्र अध्यन करने के बाद सलाहकारों की सहमति से यह निर्णय लिया गया कि उक्त रिपोर्ट में इंगित कारणों के निदान के लिए एक अलग विभाग गठित किया जाये जिसका कार्य केवल गरीबी मिटाने के लिए सरकार को सुझाव देना हो,
विभाग गठित हुआ और काम भी शुरू हो गया ।

जैसा की सरकार का निर्देश था,गरीबी की समस्या जड़ से खत्म होनी चाहिए, अर्थात,गरीबी नामक वृक्ष को काटा नही जाये,बल्कि उसको जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया जाये और ज़मीन में मट्ठा डाल दिया जाये ताकि बाद में कोंपलों के रूप में भी गरीबी दोबारा न उग सके।

नवगठित गरीबी मिटाओ विभाग की सरकार के साथ बैठक तय हुई, गोल मेज़ के चहुंओर अफसरान जमा हुए,साहेब भी आ पहुंचे थे,औपचारिक अभिवादन के बाद बैठक शुरू की गयी।

साहेब ने सवाल दागा-"हाँ तो मितरो, अर्र..मेरा मतलब अधिकारी महोदयों,ये गरीबी मुई कैसे मिटेगी भई?"

मुख्य अफसर ने बोलना शुरू किया,
सर! जैसा की आप जानते हैं (समझदार अफसर हर बात कहने से पहले ये कहना नही भूलता,भले से उसको पता हो कि सर ने कभी स्कूल की शक्ल तक नही देखी है) गरीबी के इंगित प्रधान कारणों में से एक था बेरोजगारी, लोगों के पास करने के लिए काम नही है, काम नहीं होगा तो पास पैसे नही होंगे,पास पैसे नही होंगे तो जीवन आभावग्रस्त हो जायेगा,जीवन जब अभावग्रस्त होगा तो चीजों का अकाल हो जायेगा, तब गरीब को मजबूरन खर्चों में कटौती करनी पड़ेगी, और महज़ उन चीजों का ही उपभोग कर पायेगा जो उसे सब्सिडी और मुफ़्त सुविधा के नाम पर सरकार के सहयोग से उपलब्ध हो जाती हैं , मसलन कम दामों पर अनाज,ईंधन वगैरह,इस प्रकार गरीब हमारे देश में किसी सूरत केवल दो वक़्त खाना खा पाता है....

(हालाँकि खाना तो आवारा कुत्ता भी खा लेता है....तो?? इस देश में गरीब और आवारा कुत्ते की हालत में दस अंतर लिखकर मुझे बताइये....मैं लिखना छोड़ दूंगा...जिस तरह आवारा कुत्ता बे घर के कभी इधर तो कभी उधर घूमा करता है उसी तरह गरीब भी कभी यहां तो कभी वहां अपना झोपडा लिए टहलता जाता है,जिस तरह कुत्ते के आगे कसाई बची खुची हड्डियों के टुकड़े फेंक दिया करता है उसी तरह सरकार...अर्रर ये तो मेरा मुद्दा भटक गया...बात यहां गरीबी मिटाने के सरकार के क़दमों के बारे में हो रही थी...)

तो बहरहाल गरीबी मिटाओ विभाग के अफसर ने आगे गरीबी के निदानों पर चर्चा शुरू की,

"इस प्रकार अभावग्रस्त जीवन जीते जीते जब गरीब आदमी बीमार हो जाता है तो उसे दवा की ज़रूरत पड़ती है...वो (मुफ्तखोर कहीं का) दवा लेने सरकारी अस्पताल जा पहुंचता है...वहां से उसे किसी तरह (जूता चप्पल घिसने और सरकारी बाबुओं और डॉक्टर की घुड़कियाँ सुनने के बाद) दवा मिल ही जाती है ।

एक मिनट,,ये गरीबों के बीमार पड़ने की दर क्या होगी बताना ज़रा? साहेब ने बीच में सवाल किया।

सर हमारे अध्यन के मुताबिक लगभग हर गरीब समय समय पर बीमार पड़ता ही रहता है।

अब अभावग्रस्त जीवन होगा तो बीमार पड़ेंगे ही....समिति के एक बुज़ुर्ग सदस्य ने बोलना शुरू किया...प्रधान कारण बेरोज़गारी ही है,जिसकी वजह से.....

साहेब बीच में बोल पड़े एक मिनट सिन्हा साहब आप रुकिये....हाँ तो वर्मा जी, ये गरीब आये दिन बीमार पड़ता रहता है...उसे हमारे हास्पिटल से मुफ़्त दवा मिल जाती है और वो बच जाता है...अगर उसे दवा न मिल तो?

बेचारा गरीब बिना इलाज के तड़प के मर जायेग सर...सिन्हा साहब दोबारा बीच में बोल पड़े ।

ओफ्फो सिन्हा साहब आप दो मिनट शांत नही रह सकते?आप बताइये वर्मा जी, 

वर्मा आँखों में चमक लिए बोले....अगर उसे दवा ना मिले फिर तो देश गरीबों की संख्या में भारी गिरावट आ जायेगी सर...

ह्म्म्म.....चलिए ठीक है.. आज की मीटिंग यहीं बर्खास्त की जाती है...कोई निर्णय संभवतः अगले सत्र में शीघ्र होगा ।

मीटिंग की खबर आई गयी हो गयी...किसी को याद भी नही रहा कि ऐसी कोई बैठक भी बैठी थी।

एक हफ्ते बाद अखबार में पहले पन्ने पर खबर छपी,

"उधोगों को दी जाने वाली सब्सिडी में 10% का इज़ाफ़ा,निवेश में बढ़ोतरी की उम्मीद,अर्थशास्त्रियों ने सरकार के क़दम की भूरि भूरि प्रशंसा की,देश में आएगी विकास की बहार"

अख़बार में अंदर ही कहीं सातवें आठवें पृष्ठ पर एक कॉलम की खबर पन्नों के बोझ से दबी अपनी आखिरी सांसे गिन रही थी,वहां लिखा था-

"स्वस्थ्य बजट में कटौती की गई,अस्पतालों को दी जाने वाली दवा सप्लाई पर सीधा असर,सरकारी अस्पतालों में नही मिलेगी मुफ़्त दवा," ।

~इमरान~

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

तामीर वाले हाथ

ये दुनिया
नज़्म है एक
या कोई ग़ज़ल
या फिर सुरीला गीत
नही जनाब,
यह दरअसल 
चंद मज़लूम हाथों की
बनाई इक तस्वीर है
तस्वीर जिसमें
बनाने वालों ने
बजाये रंग के
मिलाया है अपना लहू
और फिर अपनी हड्डियों के 

फ्रेम वाले कनवास पर

सजाकर मानिंद ए वरक़
इसे किस जतन से बनाया है
इन तामीर करने वाले हाथों ने
इसे क्या खूब सजाया है

~इमरान~

मिस्ड कॉल पार्टी

मिस्ड कॉल सदस्यता
_________________

ताज़ी खबर यह है कि बीजेपी दुनिया का सबसे बड़ा राजनैतिक दल बन गयी है, कोई भी देशवासी महज़ एक मिस्ड कॉल के माध्यम से पार्टी का सदस्य बन सकता है और पार्टी की गतिविधियों में शामिल हो सकता है,पार्टी का दावा है कि लगभग 8 से 9 करोड़ लोगों ने पार्टी की सदस्यता मिस्ड कॉल के माध्यम से हासिल की,

उधर कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि उनके मोबाइल पर पहले एक नंबर से मिस्ड कॉल आई,जब प्रवक्ता जी ने पलट कर जानना चाहा कि किसकी कॉल है तो उधर से कंप्यूटर महोदय ने एक सुरीली सी महिला की आवाज़ बनाकर नेताजी को बीजेपी सदस्यता की मुबारकबाद दी, एक तो महिला की आवाज़ वो भी सुरीली,वो कांग्रेसी ही क्या जो फिसल न जाये, एक कांग्रेसी भाजपा से या किसी भी विरोधी से चाहे जितनी चिढ क्यों न रखता हो लेकिन सुरीली आवाज़ों पर वो चित्त हो ही जाता है,मेरा ऐसा विचार है कि प्रवक्ता जी उस समय तो मंत्रमुग्ध होकर सुरीली आवाज़ सुनते रहे होंगे लेकिन बाद में छले जाने का अहसास होने पर उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस बुला डाली...

कांग्रेस से याद आया, राजनैतिक दलों की सदस्यता की भी बड़ी अजीब  अजीब प्रक्रियाएं हुआ करती हैं... एक बार लखनऊ के मेरे एक निकट मित्र जो उम्र में मुझसे काफी बड़े और शहर कांग्रेस के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष भी थे,को पार्टी की ओर से वार्षिक सदस्य बनाने का टारगेट मिला,
उन्हें तक़रीबन दो सौ के लगभग सदस्य बंनाने थे, पूरा कुनबा,आस पड़ोस और सहकर्मी मिलकर भी उनसे हो नही पा रहा था,एक शाम वो मेरे पास भी फॉर्म लेकर आ धमके,
मैंने ज़रा चौंकते हुए उनसे कहा "लेकिन मैं तो साम्यवादी विचारधारा रखता हूँ इसे आप मेरे पास क्यों लाये हैं", जवाब जो मिला वो सन्न कर देने वाला था,नेताजी बोले-'आप समझे नही रिज़वी साहब,आप चाहे जिस विचारधारा से हों,बस मेरा टारगेट पूरा करवा दीजिए उसके बाद सदस्यता पर्ची चाहे आप फाड़ कर भी फेंक देंगे मुझे कोई फर्क नही पड़ता'
मैंने हैरान परेशान देखकर उनकी बात मान ली और चाय पिलाकर किसी तरह उन्हें विदा किया,

अक्सर कॉलेजों विश्वविधालयों के बाहर कैम्प लगाये राजनैतिक दलों के कार्यकर्त्ता दिख जाते, हर आने जाने वाले छात्र छात्रा को आग्रहपुर्वक बुलाकर उनकी "पर्ची काट" कर दी जाती रहती,
इन कैम्पों में सत्ताधारी दल के शिविर के आसपास सबसे ज़्यादा भीड़ रहती है,
उत्तर प्रदेश में तो विशेषकर समाजवादी पार्टी के सदस्यता कैंपो में अच्छी खासी भीड़ हो जाती, लड़के पहले सदस्यता रसीद कटाते हैं और उसके बाद चौड़े होकर कहते "अब चलेंगे खुलकर बिना हेलमेट,देखते हैं कौन स्साला पुलिसवाला...."

हाँ इस मामले में बहनजी का कैडर बड़ा स्ट्रांग रहता है, बहनजी सदस्यता अभियानों पर कोई ख़ास ज़ोर भी नही देतीं, उन्हें मालूम है की उनका वोटर फिक्स है, कार्यकर्त्ता पूरे चुनाव घर से बाहर भी न निकले, प्रत्याशी की जगह बहनजी एक गुम्मा ही क्यों न खड़ा कर दें,  "समाज" का वोट तो बहनजी को ही पड़ना ही है,उसे कोई नही हिला सकता,

इक्का दुक्का "संसदीय कमनिस्टिए" भी भगत सिंह का पोस्टर मय लाल लाल झोला के बगल में टांगे और लंबे लंबे क्लिष्ट भाषा वाले पर्चे हाथों में लिए दिख जाते हैं....

एक बार ऐसे ही कुछ "कामरेड" एक कॉलेज के बाहर अपनी पार्टी के बारे में जानकारी देने के उद्देश्य से शिविर लगाये बैठे थे, एक दो छात्र भगत सिंह का पोस्टर देख उत्सुकतावश उनके पास गए, उनसे सदस्यता के बारे में पूछने लगे,

एक वरिष्ठ कामरेड ने उन्हें एक लम्बा सा खर्रा टिकाना शुरू कर दिया जिसमे वर्तमान राजनैतिक दलों के वर्गचरित्र और दुनिया पर आसन्न आर्थिक संकट का सविस्तार तकनीकी वर्णन था.....

पर्चे पर यह भी लिखा था की "भारत में मार्क्सवादी दृष्टिकोण की एकमात्र सही लाइन केवल उनकी पार्टी के पास ही है और उनकी कोई अन्य शाखा नहीं है...संशोधनवादियों से होशियार"

एक छात्र पर्चा लेकर उसको पढ़ने लगा,अभी 2-4 लाइन ही पढ़ी होगी उसने और मुस्कुराते हुए पर्चा वापस लौटा दिया, उसने उन से उसमे लिखा लेख मर्म सहित समझाने को कहा, एक कामरेड ने समझाना शुरू किया लेकिन उनकी भाषा और पर्चे की भाषा में कोई ख़ास अंतर नज़र न आते देख छात्र आगे बढ़ गए, बाकियों ने भी सर खुजाना शुरू कर दिया,

भाषा पर्चे की इतनी क्लिष्ट थी की छात्रों ने अपने पूरे जीवन में इतने खतरनाक शब्द ना पढ़े होंगे, एक छात्र जो ज़रा जल्दी में था और पर्चा लेकर कॉलेज में दाखिल हो गया, उसको पर्चा बड़ा सुंदर लग रहा था, उसपर भगत सिंह की तस्वीर बनी थी,उसके पड़ोस में रहने वाले आरएसएस के एक अंकल उसे अक्सर समझाया करते "सरदार भगत सिंह" एक सच्चे "राष्ट्रवादी" और "माँ भारती के सच्चे लाल थे" भगत सिंह का व्यक्तित्व उसे बड़ा आकर्षित करता,

बस उनके विचार उसे नही मालूम थे उसने सोचा वो उन्ही अंकल से भगत सिंह के विषय में भी पूछ लेगा...
पर्चे पर हंसिए हथौड़े का चिन्ह भी मौजदू था,बस भाषा इतनी तकनीकी किस्म की थी कि उसका तात्पर्य उसके पल्ले नही पड़ रहा था,
छात्र ने अपने एक गुरु की सहायता से उनको समझना चाहा, गुरूजी पर्चा देखकर बोले -"अभी मुझे स्टाफ हॉल में एक बैठक में शामिल होने जाना है,बाद में समझाता हूँ"

छात्र को समझते देर न लगी की गुरूजी की चिकनी टंट से ये शब्द उसी तरह फिसल चुके हैं जैसे उसके सर से स्टैट्स की क्लास का लेक्चर निकलता है...अक्सर कक्षा में भी किसी छात्र के कोई तकनीकी विषय को एकर प्रश्न पूछ लेने पर गुरूजी इसी तरह विचलित हो जाया करते थे और कभी छात्रों को विषय ने ना भटकने और कभी विषय से सम्बंधित होने पर "कल बताऊंगा" कहकर टाल दिया करते थे..
छात्र अब तक चिढ गया था,उसने पर्चा फेंका और आगे बढ़ गया..
थोड़ा आगे जाने पर एक दिवार के खम्भे के ऊपर उसकी नज़र पड़ी, वहां पीएम की खूबसूरत तस्वीर के साथ एक सुन्दर सा पोस्टर लगा था,पोस्टर पर लिखा था, "बीजेपी के सदस्य बनें,सिर्फ एक मिस्ड कॉल दें और जुड़ें सीधे मोदी के साथ"

छात्र ने जेब से मोबाइल निकाला और नंबर डायल करना शुरू कर दिया....

~इमरान~