गुरुवार, 5 मार्च 2015

होली कथा

जौनपुर के हमारे मोहल्ले में होली की तैयारियां अभी से शुरू हो गयी हैं, कानफोड़ू डीजे पर रंगारंग गाने बज रहे हैं। अश्लील भोजपुरी गानों के आधे समझ में आते और आधे सर के ऊपर से गुज़रते अलफ़ाज़ सुनकर ही हाथ बरबस कान पर चले जाते हैं, लोग तो अभी से सूखे रंगों में रंगे हुए सड़क पर नाचना शुरू कर दिए हैं , कल चौराहे पर ऊंची जगह एक मटकी टांगी जायेगी,और फिर मटका फोड़ प्रतियोगिता शुरू होगी...हर साल की तरह इस साल भी मैं अपनी छत से चाय पीते और धूप सकते हुए इस पूरे कार्यक्रम का मज़ा लूँगा। लेकिन इस बार ज़रा अतिरिक्त सावधानी रखते हुए क्योंकि पिछली बार सामने वाले घर के एक भाईसाहब ने वहीं से अपनी प्रेशर वाली बड़ी पिचकारी का सटीक निशाना लगाकर मेरे ऊपर रंग डालने और मेरी उजाला व्हाइट शर्ट को लाल गुलाबी करने में कामयाबी हासिल कर ही ली थी,हमें मुखबिर ने होशियार कर दिया है की भाईसाहब इस बार भी ताक में हैं लेकिन अबकी मैं उनकी साज़िश कामयाब नही होने दूंगा.....

ऐसा नही है की मुझे त्यौहार नापसंद हों, इस दुःख और चिंताओं से भरी दुनिया में खुश होने के बहाने किस इंसान को बुरे लग सकते हैं....लेकिन बस अब मुझे रंगों से थोड़ी चिढ सी होती है. वो भी इसलिए की ये आसानी से छूटते नही और फिर एक तो अब मेरा ये बचकानी हुड़दंग बाज़ीयां करने का मन भी नही करता,

होली के बारे में जो बात मेरे लिये सबसे ख़ास है वो यह कि रंगो का त्यौहार मुझे हमेशा मेरे लखनऊ और मेरे बचपन की याद दिला देता है,

लखनऊ के जिस शिया बाहुल्य क्षेत्र में हम रहते थे वहां 21 मार्च यानि नौरोज़ के दिन खूब रंग खेला जाता है। बिलकुल होली जैसा हुड़दंग होता है और वैसे ही पकवान घरों में बनते हैं।
इस दिन हम शाम होने तक अपनी पिचकारियाँ लिए पूरे मोहल्ले के हर घर में घुस घुस के रंग खेला करते थे। वो मोहल्ला क्या था एक सामूहिक परिवार हुआ करता था जहाँ दो ढाई सौ के क़रीब सभी घरों में बिना आवाज़ बिना आहट किये डायरेक्ट इंट्री हुआ करती थी हमारी। एकदम जैसे अपने घर में जाते हैं ठीक वैसे ही।और बिलकुल परिवार के किसी सदस्य की भाँती व्यवहार करते थे हम एक दूजे से।
चैराहे पर टोली बनाकर खड़े होना और हर आने जाने वाले को रंगो से सराबोर कर देना.....दो गधे पकड़कर उनको रँगना और फिर उनपर किसी खिलौनेनुमा शख्स को उलटा बिठाकर पूरे मोहल्ले में उसका जुलुस निकालना....
फिर सारा दिन रंग खेलने के बाद इलाके की मस्जिद के हौज़ की साफ़ सफाई भी हम मोहल्ले के सारे लड़के मिलकर करते थे।
इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था की हौज़ की कोई मछली मरने ना पाये और उनको एक बड़ी पन्नी में जमा करके वापस सफाई के बाद हौज़ में छोड़ने का इंतज़ाम पूरी ज़िम्मेदारी से किया जाता था,

चूँकि हम नौरोज़ में खूब रंग खेलते थे लिहाज़ा बचपन से ही हमारे लिए हमारे नौरोज़ की तरह होली भी बस एक रंगों का और खुशियों के मनाने का त्यौहार हुआ करता था....और होली में भी बगल के चौपटियां या अम्बरगंज साइड निकल कर अपने हिंदी नाम वाले दोस्तों के साथ रंग खेल आया करते थे और दावत भी उड़ा लेते थे। (इस होली की दावत के एवज़ बक़रीद की मटन बिरयानी की दावत हमारे ज़िम्मे होती थी)

खैर.....होली और नौरोज़ के बीच हमे कोई फर्क तब तक नही समझ आया था जब तक किसी शैताननुमा इंसान ने कानों में हिन्दू और मुसलमान नामी दो शब्दों का ज़हर नही घोला था।
बहरहाल हमने भी नीलकंठ की तरह इस ज़हर को अपने गले में ही रोक लिया दिल में ना उतरने दिया कभी...
और जब तक नौरोज़ में रंग खेला किये तब तक कोई होली भी सूखी न जाने दी।
शब् ए बरात जब तक आतिशबाज़ी की तब तक दीवाली को भी अपने घर से अँधेरे में ना गुजरने दिया।
फिर वक़्त के साथ ज़ेहन बूढा सा हो गया और रंग खेलना और पटाखे जलाना बचकानी हरकतें लगने लगीं।
अब यही काम बच्चों को करते देख खुश भर हो लेते हैं....हाँ लेकिन "अन्य पर्वोचित खान पान" और मेल मिलाप से अब भी कोई परहेज़ नही करते....अभी ये लिखते वक़्त भी पड़ोस से आई मीठी गुझिया की प्लेट सामने रखी हुई है।

एक सबसे ख़ास हमारे साथ चीज़ और होली और नौरोज़ की यादों से जुडी है यह की ये दोनों दिन हमारी सालाना पिटाई के दिन हुआ करते थे।
मसला दरअसल ये था की हम रंग खेलना नही छोड़ सकते थे और पापा हमारा मोहल्ले के "लोफर लौंडों" के साथ खेलना बर्दाश्त नही कर सकते थे...
लेकिन जब तक हमारे मन में होली और नौरोज़ के रंगों के खेलने की इच्छा जीवित रही तब तक पापा से बावजूद पिटाई खाने के यह असहमति भी चलती रही।
ना मेरा विद्रोही स्वभाव किसी पिटाई के डर से मुझे मेरी पसंद का खेल खेलने से रोकने देता ना पापा की मुझे "सुधारने" की ज़िद उन्हें मेरी पिटाई करने से रोकती....

बाद में थोडा बड़े होने पर पापा से यह असहमतियां वैचारिक रूप धारण करती गयीं। ऐसा होने पर अब पिटाई बन्द हो गयी और सम्मान मिलना शुरू हो गया।

खैर अब तो न रंग खेलने वाला वो बालमन रहा न अब पापा ही रहे। लेकिन सच कहें, होली और नौरोज़ के उन रंगों से ज़्यादा आज पापा और उनकी वो पिटाई याद आती है, मन करता है किसी तरह पापा वापस उस बेकार सुनसान से क़ब्रिस्तान की अपनी आरामगाह से उठकर वापस आएँ और अपना वही खादी का कड़क सफेद कुर्ता पैजामा पहन मेरे सामने आकर खड़े हो जाएँ, मुझको डांटे,मुझसे तर्क वितर्क करें....मुझे शुद्ध वाली हिंदी सिखाएं...मेरे साथ कैरम खेलें और  हमेशा की तरह मुझसे जानबूझ कर हार जाएँ.....मेरे साथ क्रिकेट खेलें और जानबूझ कर मुझे चौका जड़ने वाली गेंद फेंके...जान बूझकर मेरी गेंद पर आउट हो जाएँ...और मैं उनसे ज़िद करूँ की मेरे साथ ये जानबूझकर वाला नही सही वाला खेल खेलिए।

कभी कभी तो मन करता है की किसी नौरोज़ या होली पर खुद को रंगों में सराबोर करके उनकी आरामगाह के सामने जाकर खड़ा हो जाऊं...
शायद वो मुझे सज़ा देने ही सही एक बार बस एक बार उठकर मुझसे बात ही कर लें...मुझको बता तो दें की कौन सी नाराज़गी के चलते मुझसे बिना बात किए वो उस दिन अचानक ऐसे क्यों चले गए थे मुझे छोड़कर उस सुनसान जगह रहने...
लेकिन फिर मेरा ज़ेहन मुझे समझा ही ले जाता है कि ठहर जाओ मियां,अब वो दिन नही आने वाले ।

~इमरान~

बुधवार, 4 मार्च 2015

साक़ी मेरे

उसकी आँखों को तुमने देखा नही,

साकी तुम भी नशे में आ जाते,

रख देते कनारे बोतल को,

साकी तुम इस क़दर बहक जाते,

उसकी ज़ुल्फ़ों के पेंच ओ ख़म देखे,

साक़ी तुम भी कहीं उलझ जाते,

तुमने क़दमों पे नज़रें की ही नही

मिस्ल ए मूसा ग़शी तो खा जाते,

उसकी मुस्कानों से नूर साते था,

साकी तुम तूर से उतर आते,

ज़िन्दगी के वरक़ नए खुलते,

साक़ी तुम भी उसे जो पढ़ जाते,

वज़ऊ करते हरम में तुम बेशक,

साक़ी मयखाने में बाअदब आते....

ट्रेन का आधा घण्टा

बर्थ के पास चार्जिंग पॉइंट न होने के चलते ट्रेन मे दरवाज़े के पास वाली जगह फर्श पे ही आधा बैठ गया हूँ और मोबाइल चार्ज कर रहा हूँ,वक़्त कट जाये और बोरियत न हो लिहाज़ा नोटपैड ऑन करके लिखने बैठ गया।

32% बैटरी चार्ज हो चुकी है, तुमसे बात होते होते नेटवर्क चले जाने की वजह से फोन जो कटा तो अभी आधे घण्टे बाद तक नेटवर्क की कोई उम्मीद नज़र नही आ रही है, ऊपर से हर दस मिनट के बाद ये पिन लूज़ होने के कारण फोन ढंग से चार्ज भी नही हो पा रहा।

पॉइंट से लटकता चार्जर का तार बार बार मेरे चेहरे को ऐसे छू रहा है मानो तुम्हारी ज़ुल्फ़ें मुझसे छेड़खानी कर रही हों।

ट्रेन के दरवाज़े और खिड़की से आती मस्त मस्त हवा तुम्हारी उदासी और बेक़रारी की कहानी मेरे कानों में फुसफुसा रही है।

बाहर दिखाई पड़ते और तेज़ी से ओझल हो जाते अपने ऊपर पीलापन की चादर ओढ़े अधलेटे उजड़े से खेत बेमौसम की बरसात के बाद किसानों का दर्द बयान कर रहे हैं।

एकाध चमकती आँखों वाला रात्रिचर प्राणी भी अपने सामने रेंगती इतनी बड़ी इल्ली (ट्रेन) को देखकर चौंकता हुआ इधर उधर तकता नज़र आ ही जा रहा है। और आज इन सब में चाह कर भी मैं कोई रुमानियत तलाश नही कर पा रहा हूँ।

बगल से वक़्त बेवक़्त गुज़रती दूसरी ट्रेनों को देखने पर एकबारगी तो ऐसा सा लगता है कि ये सामने वाली ट्रेन चल रही है या अपनी वाली रुक गयी है। फिर उसके गुज़र जाने पर भरम खुलता है की दोनों बराबर चल ही रही थीं।
ऐसे मौक़ों पर तुम्हारी याद के साथ साथ दुष्यंत कुमार का यह शेर बड़ा दिल जलाता है....

"तुम किसी रेल सी गुज़रती हो,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ"

खैर, ये डिब्बा तो आज एकदम फुल है। अजब अजब तरह के लोगों की गजब गजब प्रकार की बातों की आवाज़ें आ रही हैं।

वापसी का रिजर्वेशन न मिल पाने के चलते अम्मी को लेडीज बोगी में बिठाकर खुद इस जनरल बोगी में चढ़ गया था। सौभाग्य से एक बर्थ खाली मिल तो गयी लेकिन डिब्बे में बड़ा शोर है,कोई अपने मोबाइल में गाने बजा रहा है और कोई मस्त लेटा भजन सुन रहा है,

मेरे सामने वाली बर्थ पे एक बॉडी बिल्डर टाइप लौंडा लेटा हुआ है। उसके नीचे विंडो के आमने सामने दो वाली सीट पर बैठी लड़की के साथ उसका नैन मटक्का अभी शुरू हुआ ही था कि लड़की के साथ आई एक बूढी अम्मा ने उन दोनों की हरकतों को ताड़ लिया और लड़की की कमर के पास ले जाकर हल्के हाथ से इशारे से कुछ "समझा" दिया।

लड़की ने एकबारगी दादी की चुटकी से हुमक के अपना मासूम सा चेहरा एकदम बुरा और उदास सा बना लिया।
अब उसकी आँखों से ही उसके कमर पे पड़ा संभावित नील और नील का का दर्द साफ़ नज़र आने लगा था।

दादी की नसीहत के बाद से उसका चेहरा वैसे ही उतरा हुआ है जैसे तेज़ शुरू हुई बारिश के अचानक रुक जाने पर उन बच्चों का मन उतर जाता है जो बूंदे पड़ना शुरू होते छत पे पानी में छपर छपर करने बस चढ़े ही थे की बरसात थम गयी।

लड़का भी एक बार "ओ शिट" मुद्रा का मुंह बनाकर नाउम्मीदी में अपना "समाजवादी लैपटॉप" खोल कोई मूवी देखने बैठ गया है।

पीछे वाली बर्थ से कुछ सियासी गुफ्तगु की आवाज़े सुनाई देने पर कुछ अच्छी चर्चा सुनने की लालसा में उधर का रुख किया ही था की एक वाणी ने पलभर को दिल ही दहला दिया।

-""विकास तो हो ही रहा है भाईसाहब,अब देखिये,चाइना की हालत वैसहे पतली हुई गयी है सारे सैनिक हटा लिए हैं..... उधर पाकिस्तान भी भीगी बिल्ली बना हुआ है,इस मियांवे नवाज़ की क्या हैसियत है मोदी के आगे?? क्या कहा?? कश्मीर की सरकार?अरे भाई इतना भी नही समझते आप तो बात करना ही बेकार है....अब शुरुआत में सत्ता पाने के लिए थोड़ा समझौता करना ही पड़ता है फिर वहां कश्मीर में भी तो विकास......""

कोई मूँछ धारी भीमकाय बाबू क्लर्क टाइप अंकल अपने पूरे संभव वाकचातुर्य और बुद्धि कौशल से संगठन धर्म निभाने में व्यस्त थे और बड़ी चतुराई से लोगों को मूर्ख बनाने का अपना आदिकालीन कार्यक्रम चालू किये हुए थे।
बहरहाल, सुबह 4 बजे से लगातार जागने और दोहरा ट्रेन का सफर करने के साथ साथ तुमसे बात न हो पाने की खुन्नस के चलते इसके आगे कि "विकास गाथा" सुनने की हिम्मत भी न कर सका, (कह तो ऐसे रहा हूँ की जैसे सब कुछ् ठीक होने पे कर पाता)

इधर ये आवाज़ खत्म हुई थी की नीचे से एक सदा और आई,
-"ससुरी के आउटर पे रोक न दें बस,स्स्साला एक बार जौनपुर उतार जाए उसके बाद जफराबाद में एक घनटो रोक दें तो अपने को दिक़्क़त नय..."

यह सुन के तीन बन्दों की दूरी पे बैठे एक अन्य महाशय ज़ोर से हँस दिए,उनकी हँसी सुनकर पहले वाला बन्दा उनकी तरफ मुखातिब हुआ और पूछा

-"आप भी जौनपुर जा रहे हैं क्या?
"जी हाँ जा तो रहा हूँ"
"तभहे तूँ इतनी ज़ोर से हसे हो"
"दोहरा बा की ना ?केहर जाहियो जौनपुर"
"सनकर का है"
"देतेओ राजू कउनु का हो"
    
(दो ठेठ जौनपुरिये एक दूसरे के गृहनगर भेद खुल जाने पर इसी लहजे में बतियाया करते हैं...नोट-"हम ठेठ जौनपुरिये नही हैं,लखनव्वा मिक्सचर हैं,और दोहरे का मतलब समझने के लिए एक बार जौनपुर विजिट करना होगा)

खैर ..... दस बजकर अट्ठाइस मिनट हो चले हैं और नेटवर्क आने के आसार नज़र नही आ रहे।

लम्भुआ स्टेशन आने वाला है और उसके बाद बदलापुर फिर अपना जौनपुर। तब तक एक घण्टा बगल में बाआवाज़ बुलंद अपनी गर्लफ्रेंड से बात कर रहे युवक की आवाज़ मेरे कानो में पड़ती रहेगी और मैं कुछ नेटवर्क के गायब होने और कुछ तुम्हारी मसरूफियत के चलते इधर बैठ इसकी लल्लो चप्पो सुन सुन कर कुढ़ता रहूंगा।

अब तो ठण्ड लगना भी शुरू हो गयी है,इलू फिलु भी फैला हुआ है। लिहाज़ा मैंने ट्रेन का दरवाज़ा बन्द करवा दिया और अब अगरबत्ती सुलगाने जा रहा हूँ....बाक़ी की फिर कभी।

~इमरान~

सोमवार, 2 मार्च 2015

ज़िन्दगी के मोड़

ज़िन्दगी के मोड़ों पर,

ठहराव नही होते,

ये ले जाती है,

हमको दरबदर हर सूँ,

कहीं वफ़ा की तलाश,

तो कहीं प्यार के लिए,

कहीं खो जाता है दिल,

कैसे तस्कीन के लिए,

वजह बस ये है,

हम नामुकम्मल इंसान,

खोजने निकले है जो,

किसी तकमील के निशां,

होते खुद हैं,

अधूरे लेकिन,

खोजते फिरते हैं

कामिल इंसान....

~इमरान~

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

तुमने आने में देर करी

जब मेरा आँगन महका था

बारिश की पहली बूंदों से,

तुमने आने में देर करी

वो मेरा आँगन सूख गया

जब सारी बगिया महकी थी,

गुलशन की नन्ही कलियों से,

तुमने आने में देर करी,

सुनसान गुलिस्तां हो ही गया,

कल सहरा में मिलना था हमें,

ख्वाबों को सच करना था हमें,

तुमने आने में देर करी,

सब ख्वाब का सेहरा टूट गया,

उस दुनिया में कितनी झिलमिल थी,

जिस जग में हमने रहना था,

तुमने आने में देर करी,

वां हश्र बपा एक हो सा गया,

जिस सेज़ पे हमने सोना था,

सपनो को सच्चा करना था,

तुमने आने में देर करी,

उस सेज़ का बेला सूख गया,

चाहत के रम्ज़ समेटे थी,

ऑंखें मेरी कुछ भीगी थीं,

तुमने आने में देर करी

आँखों का पानी बह सा गया,

दुनिया की रीत बदलनी थी,

किताबें नई कुछ लिखनी थीं,

तुमने आने में देर करी,

किताबों का किस्सा भूल गया,

जब वक़्त के आगे बढ़ना था,

संग साथ हमारे चलना था,

तुमने आने में देर करी,

तो पाँव का छाला फूट गया,

जिस नगरी में हम रहते थे

वो पास तुम्हारे थी बेहद,

तुमने आने में देर करी,

और फासला फिर बढ़ता गया,

~इमरान~

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

एक शायर

एक शायर.....

कितना तनहा होता है,

बावजूद अलफ़ाज़ के हुजूम के,

बावजूद कहकशां औ गुलशन के,

मौजूदगी होती है,

बहारों की उसके गिर्द,

खिलते फूलों की खुशबु

किया करती है तवाफ़,

कभी महबूब की डोली

तो कभी आशिक़ की सेज़,

कभी रातों के किस्से

तो कभी दिन के अफ़साने,

उसको घेरे रहते हैं

अज़ बला के दीवाने,

बावजूद इस भीड़ के

दिल से शायर के

गर सोच सको तो,

कैसे जीता है वो

लफ़्ज़ों के सहारे जीवन,

चन्द शब्दों के या

किन्हीं किस्सों के सहारे जीवन,

एक शायर का दर्द

समझा न किसी ने क्योंकर,

दर्द आँखों में उतार आया है

यही आज नज़्म बनकर....

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

वो लफ्ज़.....


____________

वो लफ्ज़ जो कभी,

दिल से सुने जाते थे,

वो बातें जो कभी,

ज़हनों में की जाती थीं,

जहाँ तक किसी भी,

मसीहा की,

रसाई ना थी,

तय रास्ते वो भी,

साथ किये जाते थे,

जिधर से पलटने वाले,

सभी आंसू लिए पलटे,

ख़ुशी की तलाश में,

उस जां हम बढ़े जाते थे,

अब....अब न जाने,

क्या बदलाव आया है,

सफ़र ज़िन्दगी का,

किस रुख पे,

हमें लाया है,

लफ्ज़ समझने वाले,

जो लोग मिले थे हमको,

अब वही लोग क्यों,

खामोश नज़र आते है,

दूरियां लगे खुद वो बढ़ाने

जिसकी तन्हाई में,

बस हम ही हम आते हैं,

कोई तूफ़ान था वो,

या कोई सख्त सैलाब,

सबसे पुख्ता जो,

सहारे थे छुटे जाते हैं,

एक क़दम बढ़ता है,

दो पीछे वो हटाता है,

कौन से ख्वाब हैं जो,

उसको यूँ डराते हैं,

लग्ज़िशें बेसबब हैं,

या कोई रम्ज़ है उनमें,

साये माज़ी से,

निकलते हैं चले जाते हैं,

अपने सरमाये बस,

लफ्ज़ थे जो चन्द अपने,

लफ्ज़ वो ही क्यों,

दुबारा ना पढ़े जाते हैं,

अजनबी तब न लगे,

जब वो मिले थे हमसे,

क्यों वही आज,

मेरे गैर हुए जाते हैं,

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

अमृता प्रीतम के नाम

अमृता प्रीतम के नाम.....

हर एक बोलती,

नज़्म में उसकी,

एक नया ही,

किस्सा हुआ करता थ,

हर एक बात में,

उसकी बातों की,

एक नया रम्ज़,

बसा करता था,

रम्ज़ जिसमें थी,

जन्मों की कहानी मौजूद,

कोई नई सी तो,

कोई थी पुरानी मौजूद,

वो एक अलफ़ाज़ का,

पैकर थी कोई रौशन सा,

नई नज़्मों का वो एक,

चश्मा थी कोई उजला सा,

उसकी आँखों में सदा,

इश्क़ रहा करता था,

कहीं साहिर तो कहीं,

इमरोज़ बसा करता था,

वो वफ़ा की हुआ करती,

थी गज़ब की पाबंद,

जिसने ठुकराया उसे भी,

नहीं छोड़ा उसने,

नाम बेमतलब ही सही,

नाम तो था लेकिन,

लफ्ज़ ए प्रीतम को,

हमेशा ही था ढोया उसने,

इमरोज़ के कनवास तो,

कभी साहिर के अल्फ़ाज़, 

वो चला करती थी कभी,

गुफ्तगू ए गुलज़ार के साथ,

अब मेरे लफ्ज़ में,

आई है वो हवा बनकर,

अमृता दिल में उतर आई है,

इक दुआ बनकर.....

~इमरान~


मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

आज यार मेहरबाँ था

आज यार कुछ मेहरबाँ था,

उसने मुझको बुला लिया साकी,

बाद मिलने के उसके सहरा में,

हमने इक जश्न मनाया साकी,

तेरे पैमाने को रहने ही दिया,

उसने होंठो से पिलाया साकी,

आज यार कुछ मेहरबाँ था,

हमने ख्वाबों को सजाया साकी,

उसके दीदार की तलब थी मुझे,

उसने सागर जो छलकाया साकी,

आज यार कुछ मेहरबाँ था,

सीधे दिल में उतर गया साकी,

मैंने रोका भी नहीं उसको ज़रा,

जो भी करना था कर गया साकी,

आज यार कुछ मेहरबाँ था,

मेरी साँसों को छू गया साकी,

मैंने दिल से उसे सलाम किया,

ज़िन्दगी का हुआ दौराँ साकी,

आज यार कुछ मेहरबाँ था,

उसने मुझको बुला लिया साकी....

~इमरान~